मार्च की ढलती शाम थी।
सूखी झील के किनारे, हाथों में हाथ लिए उसने धीरे से पूछा,
“फिर कब मिलोगी?”
वह थोड़ी देर आसमान की ओर देखती रही,
फिर मुस्कुरा कर बोली,
“जब सितारे चाहेंगे… तब।”
दिन बीत गए, मौसम बदल गए,
पर वह आज भी हर रात आसमान में,
उन सितारों की रजामंदी का इंतज़ार करता है। ✨