Wednesday, June 24, 2026

लाउंज

दिल्ली एयरपोर्ट की सुबह मुझे हमेशा किसी बड़े रेलवे स्टेशन की याद दिलाती है। फर्क बस इतना है कि यहाँ कुलियों की जगह ट्रॉलियाँ दौड़ती हैं और चायवालों की आवाज़ों की जगह लगातार होती घोषणाएँ सुनाई देती हैं। बाकी भीड़, भागदौड़ और चेहरों का समुद्र लगभग वैसा ही लगता है।

उस सुबह राकेश सिंह बेंगलुरु जाने वाली फ्लाइट का इंतज़ार कर रहा था। सरकारी नौकरी करते करते उसे बीस साल हो चुके थे। इलाहाबाद से दिल्ली आए चार साल हो गए थे, लेकिन मन का एक हिस्सा अब भी रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर ही अटका रहता था। ट्रेन में सफ़र करते समय उसे हमेशा लगता था कि यात्रा शुरू हो गई है। हवाई जहाज़ में तो सब कुछ इतना जल्दी होता है कि आदमी समझ ही नहीं पाता कि निकला कब और पहुँच गया कब।

तीन महीने पहले उसकी पत्नी ने ज़िद करके उसके लिए एक क्रेडिट कार्ड बनवाया था।

"कम से कम एयरपोर्ट पर चाय नाश्ता तो आराम से कर लिया करो," उसने कार्ड हाथ में देते हुए कहा था।

राकेश ने उस समय हँसकर बात टाल दी थी, लेकिन सच तो यह था कि उसे भी थोड़ा अच्छा लगा था। ज़िंदगी में पहली बार उसे लगा था कि शायद वह भी उन लोगों की दुनिया के थोड़ा करीब पहुँच रहा है, जिन्हें देखकर उसका बेटा अक्सर कहता था,

"पापा, आप भी कभी बिज़नेस क्लास में जाया करो।"

फ्लाइट में अभी काफी समय था, वह जल्दी एयरपोर्ट पहुँच गया था।

सिक्योरिटी चेक के बाद जब वह लाउंज की लाइन में लगा, तो आसपास के लोगों को देखने लगा। आगे खड़ा एक लड़का वीडियो कॉल पर किसी को पूरा लाउंज दिखा रहा था। पीछे खड़े सज्जन किसी को कार्ड के फायदे समझा रहे थे।

"नहीं भाई, यह वाला कार्ड अब लिमिटेड एंट्री देता है। दूसरा लेना पड़ेगा।"

राकेश मुस्कुरा दिया। उसे अचानक याद आया कि कुछ साल पहले तक उसे यह भी नहीं पता था कि एयरपोर्ट लाउंज जैसी कोई चीज़ होती है।

करीब पच्चीस मिनट बाद उसकी एंट्री हुई।

अंदर पहुँचकर उसे हल्की सी हैरानी हुई। उसके मन में जो तस्वीर थी, यह जगह उससे काफी अलग थी। लगभग सारी सीटें भरी हुई थीं। कहीं प्लेटों की आवाज़ आ रही थी, कहीं बच्चे रो रहे थे, कहीं लोग मोबाइल पर मीटिंग कर रहे थे।

उसने दो इडली, एक समोसा और थोड़े से फल प्लेट में रख लिए। कॉफ़ी लेने गया तो वहाँ भी लाइन लगी थी।

कॉफ़ी लेकर वह आखिरकार खिड़की के पास एक सीट पर बैठ गया।

बाहर सामान्य वेटिंग एरिया दिखाई दे रहा था। एक बुज़ुर्ग आराम से अख़बार पढ़ रहे थे। पास में एक महिला अपने बच्चे को गोद में सुलाने की कोशिश कर रही थी। कुछ लोग बस चुपचाप बैठे थे।

उन्हें देखकर न जाने क्यों राकेश को लगा कि वे लोग उससे ज़्यादा सहज हैं।

तभी पास वाली मेज़ से बातचीत की आवाज़ आई।

"यार, मेरा कार्ड अब लाउंज एक्सेस नहीं दे रहा।"

"तो दूसरा ले ले।"

"उसकी फीस?"

"लगभग बारह हज़ार साल की।"

राकेश ने अनायास अपनी कॉफ़ी का कप नीचे रख दिया।

उसकी नज़र सामने लगे एक और काँच के दरवाज़े पर गई।

प्रीमियम मेंबर्स ओनली।

उस दरवाज़े के पास भी कुछ लोग खड़े थे। एक व्यक्ति ने अपना कार्ड दिखाया, लेकिन स्टाफ़ ने विनम्रता से मना कर दिया।

राकेश के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

उसे अपना बचपन याद आ गया।

कानपुर वाले पुराने घर में एक कमरा ऐसा था जहाँ बच्चों का जाना लगभग मना था। दादी उसे तहख़ाना कहती थीं। वहाँ अनाज के बोरे, अचार के मर्तबान और न जाने क्या क्या रखा रहता था।

राकेश और उसके दोस्त अक्सर सोचते थे कि वहाँ ज़रूर कोई ख़ज़ाना छिपा होगा। जिस चीज़ तक पहुँच न हो, वह हमेशा ज़्यादा कीमती लगती थी।

सामने काँच के उस दरवाज़े को देखते हुए उसे अचानक लगा कि इतने सालों में बहुत कुछ बदल गया है, पर शायद इंसान नहीं बदला।

बचपन में तहख़ाना था।

फिर कॉलेज में कुछ ऐसे लोग थे जिनके जैसा बनना था।

नौकरी में कुछ ऐसे पद थे जहाँ पहुँचना था।

अब एयरपोर्ट पर लाउंज है। लाउंज के भीतर एक और लाउंज है।

शायद ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा अगले दरवाज़े को देखते हुए ही निकल जाता है।

उसी समय बोर्डिंग की घोषणा हुई।

राकेश ने बैग उठाया और बाहर निकलने लगा। जाते जाते उसने एक बार फिर उस प्रीमियम दरवाज़े की तरफ़ देखा।

फिर खुद ही मुस्कुरा दिया।

उसे मालूम था कि अगली बार मौका मिला तो वह उस दरवाज़े के भीतर जाने की कोशिश ज़रूर करेगा।

और उसे यह भी मालूम था कि उसके आगे शायद एक और दरवाज़ा होगा।

Friday, June 5, 2026

घिसी हुई सैंडलें

वो करीब पच्चीस साल की होगी।
हर महीने अपनी माँ को दिखाने मेरे क्लीनिक पर आती थी। 
माँ को डायबिटीज़ थी, 
किडनी भी ठीक से काम नहीं करती थी। हर बार वही पुरानी फाइल, वही दवाइयाँ, वही एकमात्र सवाल, 
"डॉक्टर साहब माँ ठीक तो हो जाएगी न"?
मैंने कई बार गौर किया था कि माँ से ज़्यादा बातें वही करती थी। दवाइयों का हिसाब, शुगर की रीडिंग, खाने-पीने की जानकारी, ये सब उसे याद रहता था।
एक दिन मैंने ऐसे ही पूछ लिया,
"बेटा तुम क्या करती हो?"
वो हल्के से मुस्कुराई और बोली,
"कुछ नहीं डॉक्टर साहब।"
मुझे उसका जवाब अधूरा लगा।
मैंने फिर पूछा,
"मतलब पढ़ाई, नौकरी, कुछ तो?"
वो कुछ सेकंड चुप रही।
"पहले बी कॉम कर रही थी। दूसरे साल में छोड़ दी।"
"क्यों?"
उसने कुर्सी पर बैठी अपनी माँ की तरफ देखा।
"पापा को स्ट्रोक पड़ा था। छह महीने के बाद चल बसे। छोटा भाई तब आठवीं क्लास में था। माँ की तबीयत धीरे धीरे खराब रहने लगी। घर में कमाने वाला कोई नहीं था।"
मैंने सोचा आगे की कहानी आम होगी।
लेकिन वो आगे बोली,
"सुबह चार बजे उठकर दूध निकालकर उसको बेचने जाती थी। 
फिर घर पर आकर माँ को संभालती। दोपहर में एक दुकान पर हिसाब किताब का काम करती थी। 
रात को थोड़ा वक्त बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी।"
वो यह सब ऐसे बता रही थी जैसे किसी और की बात हो।
"थक नहीं जाती थी?"
मैंने पूछा।
वो हँस पड़ी।
"शुरू में बहुत थकती थी। फिर आदत हो गई।"
तभी उसकी माँ ने बीच में कहा,
"डॉक्टर साहब, इसने अपने लिए कभी कुछ नहीं खरीदा।"
लड़की ने तुरंत बात काट दी,
"अरे माँ, रहने दो।"
पर माँ नहीं मानी।
"भाई को इंजीनियर बना दिया। पिछले महीने उसकी नौकरी लग गई है उसकी। पहली तनख्वाह से मेरे लिए साड़ी खरीद कर लाया था।"
मैंने लड़की की तरफ देखा।
वो खिड़की के बाहर देख रही थी।
"और तुम्हारे लिए क्या लाया?"
मेरे मुँह से निकल गया।
वो मुस्कुराई।
"मेरे लिए?"
वो कुछ पल रुकी।
"मेरे लिए उसने कहा था, 
"दीदी, अब तुम थोड़ा आराम कर लो।"
न जाने क्यों उस एक वाक्य ने मुझे चुप कर दिया।

रोज़ अस्पताल में, अलग अलग, छोटे-बड़े लोग मिलते हैं। बड़े पद, बड़ी गाड़ियाँ, बड़े परिचय वाले भी।

लेकिन उस दिन मुझे लगा कि असली ऊँचाई पर शायद वहीं बैठी थी, 
साधारण सूट पहने, घिसे हुए सैंडलों और बैग के साथ, अपनी माँ का हाथ पकड़े हुए।
फाइल बंद करते हुए मैंने अगली अपॉइंटमेंट लिख दी।
वो धीमे से उठते हुए धन्यवाद कहकर चली गई।
"शायद उसे कभी पता भी नहीं चलेगा कि डॉक्टरों की याददाश्त में मरीज नहीं, कभी-कभी उनके साथ आए लोग भी हमेशा के लिए रह जाते हैं"।