Friday, June 5, 2026

घिसी हुई सैंडलें

वो करीब पच्चीस साल की होगी।
हर महीने अपनी माँ को दिखाने मेरे क्लीनिक पर आती थी। 
माँ को डायबिटीज़ थी, 
किडनी भी ठीक से काम नहीं करती थी। हर बार वही पुरानी फाइल, वही दवाइयाँ, वही एकमात्र सवाल, 
"डॉक्टर साहब माँ ठीक तो हो जाएगी न"?
मैंने कई बार गौर किया था कि माँ से ज़्यादा बातें वही करती थी। दवाइयों का हिसाब, शुगर की रीडिंग, खाने-पीने की जानकारी, ये सब उसे याद रहता था।
एक दिन मैंने ऐसे ही पूछ लिया,
"बेटा तुम क्या करती हो?"
वो हल्के से मुस्कुराई और बोली,
"कुछ नहीं डॉक्टर साहब।"
मुझे उसका जवाब अधूरा लगा।
मैंने फिर पूछा,
"मतलब पढ़ाई, नौकरी, कुछ तो?"
वो कुछ सेकंड चुप रही।
"पहले बी कॉम कर रही थी। दूसरे साल में छोड़ दी।"
"क्यों?"
उसने कुर्सी पर बैठी अपनी माँ की तरफ देखा।
"पापा को स्ट्रोक पड़ा था। छह महीने के बाद चल बसे। छोटा भाई तब आठवीं क्लास में था। माँ की तबीयत धीरे धीरे खराब रहने लगी। घर में कमाने वाला कोई नहीं था।"
मैंने सोचा आगे की कहानी आम होगी।
लेकिन वो आगे बोली,
"सुबह चार बजे उठकर दूध निकालकर उसको बेचने जाती थी। 
फिर घर पर आकर माँ को संभालती। दोपहर में एक दुकान पर हिसाब किताब का काम करती थी। 
रात को थोड़ा वक्त बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी।"
वो यह सब ऐसे बता रही थी जैसे किसी और की बात हो।
"थक नहीं जाती थी?"
मैंने पूछा।
वो हँस पड़ी।
"शुरू में बहुत थकती थी। फिर आदत हो गई।"
तभी उसकी माँ ने बीच में कहा,
"डॉक्टर साहब, इसने अपने लिए कभी कुछ नहीं खरीदा।"
लड़की ने तुरंत बात काट दी,
"अरे माँ, रहने दो।"
पर माँ नहीं मानी।
"भाई को इंजीनियर बना दिया। पिछले महीने उसकी नौकरी लग गई है उसकी। पहली तनख्वाह से मेरे लिए साड़ी खरीद कर लाया था।"
मैंने लड़की की तरफ देखा।
वो खिड़की के बाहर देख रही थी।
"और तुम्हारे लिए क्या लाया?"
मेरे मुँह से निकल गया।
वो मुस्कुराई।
"मेरे लिए?"
वो कुछ पल रुकी।
"मेरे लिए उसने कहा था, 
"दीदी, अब तुम थोड़ा आराम कर लो।"
न जाने क्यों उस एक वाक्य ने मुझे चुप कर दिया।

रोज़ अस्पताल में, अलग अलग, छोटे-बड़े लोग मिलते हैं। बड़े पद, बड़ी गाड़ियाँ, बड़े परिचय वाले भी।

लेकिन उस दिन मुझे लगा कि असली ऊँचाई पर शायद वहीं बैठी थी, 
साधारण सूट पहने, घिसे हुए सैंडलों और बैग के साथ, अपनी माँ का हाथ पकड़े हुए।
फाइल बंद करते हुए मैंने अगली अपॉइंटमेंट लिख दी।
वो धीमे से उठते हुए धन्यवाद कहकर चली गई।
"शायद उसे कभी पता भी नहीं चलेगा कि डॉक्टरों की याददाश्त में मरीज नहीं, कभी-कभी उनके साथ आए लोग भी हमेशा के लिए रह जाते हैं"।