डाकिए ने धीरे से दरवाज़ा खटखटाया।
“चाचा, मनीऑर्डर आया है, शहर से।”
श्याम ने काँपते हाथों से रजिस्टर पर अंगूठा लगाया। लिफ़ाफ़ा खोला, अंदर वही पांच सौ के कुछ नोट थे। साथ में एक छोटी-सी पर्ची थी,
“होली मुबारक, पापा। इस बार आ नहीं पाऊँगा, साक्षी के एग्जाम हैं।”
उन्होंने धीरे से नोटों को मेज़ पर रखा और बाहर आँगन में आकर चारपाई पर बैठ गए।
सामने वही कच्ची गली थी,
जिस पर कभी उनका बेटा दौड़ता हुआ घर आता था।
होली के दिन रंगों से भरा, हँसता हुआ।
मगर पिछले कुछ सालों से सब बदल गया था,
बस एक मनीऑर्डर आता था कुछ शब्दों के साथ।
श्याम बुदबुदाए,
जैसे बेटे से बात कर रहे हो,
“तुमसे तो कहा था मैंने, कि पैसे मत भेजा करो, ये नहीं चाहिएं मुझे,
और न ही तुम्हारा भेजा हुआ प्यार।
बस तुम्हारा साथ चाहिए, वो हाथ चाहिए जो मेरे झुकते कंधों पर टिक जाए।”
उन्होंने एक गहरी साँस ली।
“सुनो बेटा,
अब मैं उतना नहीं चल पाता कि तुम्हें ढूँढने शहर आ सकूँ,
और उतना झुक भी नहीं पाता कि बचपन की तरह तुम्हारे चेहरे को पास से देख सकूँ।”
उसकी बूढ़ी आँखें फिर उसी रास्ते पर टिक गईं।
“बस इसीलिए थोड़ा सा तुमसे नाराज़ हूँ,
होली के रंग अगर तुम्हारे हाथों से आते,
तो शायद इन सूनी आँखों में भी थोड़ा रंग उतर आता।”
मेज़ पर रखे गुलाबी नोट हवा से हल्के-हल्के हिल रहे थे।
पर आँगन में फिर भी रंग नहीं था।
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