गाँव और शहर की बात करते-करते दर्पण अचानक मुस्कुरा दी। उसने देव की तरफ देखते हुए कहा,
देव, एक फर्क देखा है मैंने गाँव और शहर में। वैसे तो दोनों जगह चालाक और सीधे लोग मिल जाते हैं, लेकिन गाँव में एक सादापन अब भी बचा है। वहाँ अगर किसी को गुस्सा है तो सामने ही कह देगा,दो बात सुना देगा और फिर बात खत्म।
पर शहर में लोग दिल में ही भुनते रहते हैं। सामने मीठे, और पीठ पीछे बातें। पढ़े-लिखे शहरी लोग अपने भाव छिपाकर बड़े आराम से अभिनय कर लेते हैं, गाँव में तो लोग जो है, बस वही कह देते हैं।”
देव चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा।
दर्पण ने हल्की हँसी के साथ कहा
“लेकिन शहर में भी कुछ लोग तुम जैसे हैं, जो शहर में आकर भी दिल से ग्रामीण ही रहे। वही सादापन, वही साफ दिल। शायद इसी वजह से मैं तुम पर फिदा हो गई, क्योंकि तुममें गाँव की सच्चाई आज भी जिंदा है।”
थोड़ा रुककर उसने धीरे से कहा,
“दरअसल लोग गाँव से शहर तो आ गए, लेकिन कुछ ने अपने भीतर का गाँव बचाकर रखा। तुमने भी खुद को बचाकर रखा है, देव, क्योंकि यही तुम्हारा असली स्वभाव है।”
दर्पण ने उसकी आँखों में देखते हुए आख़िरी बात कही,
“तुम सागर हो, देव
गहरे, अथाह, मगर संयत।
और मैं एक नदी हूँ,
जो हर पल तुम्हारी ओर बहती चली आती है,
तुम्हारी बाँहों में समाने के लिए।” 🌊
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