Saturday, November 24, 2018

कॉमिक विलेज स्पीति





#कॉमिक_गांव। 
स्पीति भूक्षेत्र और संभवतः विश्व का सबसे ऊंचा गांव जो सड़क मार्ग से जुड़ा है और मोटरेबल है। लगभग 4700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस गांव की आखिरी जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या सिर्फ 114 थी। प्रकर्ति ने इस पूरे भूभाग को बेहतरीन लैंडस्केप्स से नवाजा है। चारों तरफ श्वेत धवल चोटियों से सुसज्जित पहाड़ किसी कैनवास पर सजी पेंटिंग की तरह दिखते हैं। जिधर भी आपकीं नजर जाएगी उधर ही प्रकृति निर्मित अलग नजारा देखकर आल्हादित हो जाएंगे। यह बारह महीने सड़क मार्ग से जुड़ा है सिर्फ भारी बर्फबारी की वजह से कभी कभी इसका संपर्क जिला मुख्यालय, जो कि लगभग 30 किलोमीटर दूर काजा में स्थित है, से कट जाता है। यहां पर एक प्रसिद्ध बौद्ध मठ भी स्थित है जिसमें सामुद्रिक जीवन के कई जीवाश्म उपलभ्ध हैं जो इस बात की तस्दीक करते हैं कि लाखों वर्ष पूर्व कभी इस जगह पर समुद्र विद्यमान था जो कालांतर में इन ऊंचे ऊंचे पहाड़ों में तब्दील हो गया। यहां पर रात का तापमान अधिकतर निगेटिव संख्या में ही रहता है जो कि सर्दियों में माइनस 30 या माइनस 40 तक चला जाता है। इस गांव के बेहद निकट स्थित गांव लांगजा की वो रात आज भी मेरे जेहन में ताजा है जब रात का तापमान माइनस 18 डिग्री सेंटीग्रेड था। यहां के लोग बेहद मेहनती जनजातीय लोग हैं। ये लोग सर्दियों के कठिन वक्त के लिए अपने खाने पीने की सभी सामग्री का भंडार गर्मियां खत्म होने से पहले ही कर लेते हैं। आपको यहां हर घर में लकड़ी की अंगीठी( बुखारी) जो कि ऊपर जाकर एक चिमनी से कनेक्टेड होती है जरूर मिलेगी जिससे इनका पूरा घर गर्म और आरामदायक रहता है। यहां पहुंचने के लिए पहले आपको जिला मुख्यालय काजा पहुंचना होता है। काजा बारह महीने सड़क मार्ग से जुड़ा है जहां शिमला, रामपुर पूह नाको और टाबो होते हुए पहुंचा जा सकता है। इसके अलावा गर्मियों में मनाली होते हुए कुंजम पास को पार करके भी काजा जाया जा सकता है। मनाली से कुंजम पास तक का रास्ता बेहद दुर्गम मगर बेहद खूबसूरत है। यहां वातावरण में ऑक्सीजन की कमी होने कारण शुरू में कुछ दिक्कत आ सकती है। जाने से पूर्व जरूरी दवाईयां व डाईमोक्स टेबलेट रखना न भूलें।

Sunday, November 18, 2018

चितकुल सांगला यात्रा

  अपनी 10 दिन के भ्रमण के अंतिम पड़ाव के रूप में हम 26 अक्टूबर 2018 को बास्पा घाटी में स्थित भारत तिब्बत सीमा से निकटता में अंतिम गांव चितकुल पहुंचे। चितकुल किन्नौर जिले का एक बेहद खूबसूरत जनजातीय गांव है जो बासपा नदी के तट पर सांगला से लगभग 20 किमी की दूरी पर स्थित है और बास्पा घाटी का सबसे ऊँचाई पर स्थित गांव है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग 3450 मीटर है। यह भारत - तिब्बत सीमा से निकटता में स्थित आखिरी बसे गांव के रूप में भी जाना जाता है।  कैसे पहुंचे- राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 22 पर करछम पहुंच कर दाहिने की और बास्पा घाटी जाने वाली सड़क पर सांगला व रकचम होते हुए चितकुल पहुंचा जा सकता है। करछम तक सड़क मार्ग बहुत अच्छा बना है पर वहां के बाद मार्ग दुर्गम है और अक्सर भूस्खलन होते रहते हैं। सड़क मार्ग से शिमला से चितकुल की दूरी लगभग 250 किलोमीटर और दिल्ली से 490 किलोमीटर है।   वैसे तो प्रकर्ति ने इस पूरे क्षेत्र को ही बेपनाह खूबसूरती से नवाजा है चारों और ऊंचे सफेद वस्त्र पहने पहाड़, नीचे कर्णप्रिय संगीत सुनाती बलखाती बास्पा नदी, देवदार के हरे भरे वन, सेव से लदे बागीचे हर चीज दर्शनीय है। अन्य प्रमुख आकर्षण में से एक बास्पा नदी के दाहिने तट पर स्थित इस ग्राम में ‍स्थानीय देवी माथी का मंदिर बना हुआ हैं जो गांव के मूल निवासियों द्वारा माता देवी के रूप में भी जाना जाता है और हिंदू देवी गंगोत्री को समर्पित है, यह मंदिर पर्यटकों और मूल निवासियों के बीच बेहद लोकप्रिय है। इसके अलावा इसी मार्ग पर चितकुल से पहले पड़ने वाला रकचम अपनी प्राकर्तिक सुन्दरता और अनगिनत पानी की धाराओं की वजह से देश भर में प्रसिद्ध है।   कहाँ ठहरें- पर्यटन उद्योग के विकास के साथ ही अब चितकुल और पास ही स्थित रकचम व सांगला में ठहरने के लिए पर्यटकों के पास ढेरों ऑप्शंस हैं। ढेर सारे होटल्स, लॉज, गेस्ट हाउस के अलावा होम स्टे में रुकना भी एक अलग ही अनुभव है। मैं अपनी इस यात्रा में 1 रात सांगला में होम स्टे में रुका और दूसरी रात रकचम स्थित ITBP कैम्प में ऑफिसर्स मैस में रुकने का मौका मिला।  इनके अलावा कई कैम्पिंग साइट्स भी रुकने का एक अनुभव देती हैं। इस दुर्गम इलाके में आप अपना रुकने का इंतजाम पहले से ही कर लें तो ज्यादा उचित रहता है। चितकुल में हिमाचल टूरिज्म व PWD का गेस्ट हाउस भी है।   सर्दियों के दौरान, इस क्षेत्र में भारी बर्फबारी होती है और इसके कारण इस क्षेत्र में रहने वाले लोग निचले हिमाचल के क्षेत्र में जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यहां दिन का तापमान अधिक और रात्रि तापमान बेहद कम रहता है इसलिए जब भी आएं भारी वूलन कपड़े जरूर साथ लाएं। सर्दियों में यहां पानी जमने लगता है जिस वजह से सर्दियों में मूल निवासी शौच वगेरह के लिए ड्राई पिट शौचालयों का उपयोग करते हैं।  चितकुल गांव से ट्रेकर्स चितकुल पास व गंगोत्री के लिए ट्रेकिंग का आरंभ करते हैं। यह ट्रेकिंग कठिन ट्रेकिंग यात्राओं में शुमार होती है।  इस दुर्गम पहाड़ी इलाके में एटीएम आपको मुश्किल से ही दिखाई देता है।  निकटतम पेट्रोल पंप पोवारी लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित है। सांगला व चितकुल में पेट्रोल पंप की सुविधा नहीं है। संचार सुविधाएं उपलब्ध हैं और रक्चम तक BSNL व जियो का नेटवर्क अच्छा कार्य करता है

Monday, February 29, 2016

16-ग्राम समिति की अवधारणा

जहाँ तक सफाई व्यवस्था का प्रबंध था समिति की देख रेख में गांव के बाहर पड़ी बंजर भूमि में कम्पोस्ट खाद तैयार करने के लिए सेंकडों गड्ढे बनवाए गए। प्रत्येक परिवार को उसकी आवश्यकता के अनुसार गड्ढे बाँट दिए गए। गांव का हर प्रकार का कूड़ा कचरा व् पशुओं का मल मूत्र आदि इन गड्ढो में ही डालना अनिवार्य किया गया। इस कार्यक्रम की सफलता से दोहरे उद्देश्य की प्राप्ति होने वाली थी। एक तरफ गांव में साफ़ सफाई की स्थायी व्यवस्था हुयी दूसरी और तैयार कम्पोस्ट से खेती की उपज बढ़ना तय था। 
युवक ताराचंद के निस्वार्थ व् ईमानदार प्रयासों से गांव का वातावरण बेहद प्रेरणादायक व् गतिशील हो गया। बाल्मीकि युवक भी इन प्रयासों में अपना योगदान देने को बेहद उत्सुक थे। अनेक बाल्मीकि युवकों ने बिना किसी पारिश्रमिक के गांव की नियमित सफाई करने की अपनी प्रबल इच्छा जताई। इस प्रस्ताव का सभी गांव वालो ने बेहद स्वागत किया। तय हुआ की समिति सफाई के लिए इनमें से तीन युवकों की सेवाएं ले तथा अपने स्थायी कोष से इन युवकों को आवश्यक मानदेय देती रहे। 
इन सभी कार्यक्रमों को निरंतर चलाते रहने के लिए गांव समिति के कोष में धन का नियमित प्रवाह बनाये रखना आवश्यक था। इसके लिए गांव के प्रत्येक परिवार को सालाना चंदे के रूप में अपनी जोत के अनुरूप निश्चित धन समिति के कोष में देना था। यह भी तय हुआ की शादी ब्याह व् अन्य उत्सवों के मौके पर सम्बंधित परिवार अपनी इच्छा व् भावना के अनुरूप कुछ न कुछ धन गांव समिति के कोष के लिए देंगे। 
गांव घिस्सुखेड़ा में चल रहे इस उत्साही घटनाक्रम की सूचना क्षेत्र के अनेक गांवो में भी पहुँच रही थी। युवा ताराचंद ने स्वयं भी समिति के सदस्यों के साथ समय निकाल कर इन गांव में संपर्क किया। इस प्रकार क्षेत्र के इन गांव में भी इस कार्यक्रम को अपनाने का उत्साह पैदा हो गया। इन गांव में भी इसी तर्ज पर गांव समिति गठित होने लगी। बाद के वर्षों में इस पूरे कार्यक्रम ने बहुत ही सकारात्मक व् उत्साहजनक परिणाम दिए। ऊपर से देखने पर यह पूरा घटनाक्रम बहुत ही छोटा व् सीमित लगता है लेकिन लम्बे परिपेक्ष्य में यह भविष्य में क्रियान्वित व् सफल होने वाले सहकारिता आंदोलन का उस समय के हिसाब से एक बेहतरीन व् अनूठा प्रारंभिक मॉडल था। 
युवा ताराचंद को गांव आये हुए १०-१२ दिन हो चुके थे। आज उनको कप्तान माइकल का व्यक्तिगत तार मिला जिसमें कप्तान ने यह आशा व्यक्त की, कि तुम्हारी छुटियाँ बहुत सुखद बीत रही होंगी और यदि कुछ और छुट्टियां बढ़ाना चाहते हो तो तुरंत तार द्वारा सूचित करो। आज ताराचंद जी ने अपने नजदीकी शहर जाने का मन बनाया। सबसे पहले उन्होंने पुलिस कोतवाली पहुँच कर वायरलेस द्वारा कप्तान माइकल का धन्यवाद किया तथा बताया कि और छुट्टियों की आवश्यकता नहीं है और वो समय पर पहुँच रहे हैं। इसके बाद युवा ताराचंद ने अपने कुछ पुराने साथियों से मिलने तथा पुरानी यादें ताजा करने का मन बनाया। इनमें से कुछ आजादी के राष्ट्रिय आंदोलन में सक्रिय भाग ले रहे थे जिनमें केशो दास गुप्ता व् सुमत प्रसाद जैन आदि प्रमुख थे। आजादी के बाद में केशो दास गुप्ता मुजफ्फरनगर से विधायक चुने गए तथा सुमत प्रसाद जैन भारतीय संसद के लिए इस क्षेत्र से संसद सदस्य चुने गए। कुछ और साथी अपना व्यवसाय संभाल रहे थे तथा कुछ नौकरी के सिलसिले में इधर उधर नियुक्त हो चुके थे। 

Friday, February 26, 2016

15-सामाजिक सुधार 1925-26

सन १९२५-२६ के इस दौर में भारत में ब्रिटिश शासन पूरी मजबूती के साथ कायम था। धुरी राष्ट्रों के खिलाफ निर्णायक प्रथम विश्वयुद्ध जीतने के बाद अंग्रेजों का मिजाज वैसे ही चढ़ा हुआ था। इंग्लैंड की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं पूरे उफान पर थी। इस समय ब्रिटिश शासक वर्ग का मूल उद्देश्य हर प्रकार के हथकंडे अपनाकर भारत में राष्ट्रिय आंदोलन को नाकाम करना तथा अपने शासन को और मजबूत बनाये रखना था। भारत के प्रचुर प्राकर्तिक संसाधनों तथा आसानी से उपलब्ध मानव श्रम का शोषण व् उपयोग करके इंग्लैंड की आर्थिक सत्ता को और भी मजबूत करना था। इंग्लैंड के अनावश्यक ओद्यौगिक उत्पादों को खपाने के लिए भारत मात्र एक सुलभ बाजार था। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में नागरिक सुविधाओं के विस्तार तथा जनकल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वन शासन के योजनागत एजेंडा में ही नहीं था। यही कारण था की इस काल में भारत के लगभग ५-६ लाख गांव में स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छ्ता तथा परिवहन की स्थिति बहुत बुरी थी। 
इस समय भारत के ५-६ लाख गांव में आज की तरह गांव पंचायतें नहीं थी और न ही आज की तरह पंचायती राज व्यवस्था का कोई और रूप विद्यमान था। गांव में नागरिक सुविधाओं की स्थापना व् सक्षम संचालन के लिए किसी भी स्तर पर शासन द्वारा नियुक्त कोई अन्य संस्था भी सक्रिय नहीं थी। इस समय गांव में शासन द्वारा नियुक्त एक मुखिया होता था जो गांव का ही कोई बुजुर्ग निवासी होता था। मुखिया का भी गांव के विकास व् नागरिक सुविधाओं से कोई लेना देना नहीं था। 
ब्रिटिश शासन में एक गांव का स्टेटस भूराजस्व वसूलने की एक छोटी इकाई मात्र था। यह राजस्व मालगुजारी व् भू-लगान के रूप में अनिवार्य रूप से प्रत्येक गांव से वसूला जाता था। शासन द्वारा यह लगान वसूल करने के लिए तथा उसे जिला कोष में जमा करने के लिए पटवारी व् अमीन की स्थायी नियुक्ति की जाती थी। मुखिया का भी मुख्य काम इस राजस्व वसूली में पटवारी व् अमीन आदि की मदद करना ही था। इस लगान का कोई भी हिस्सा गांव के विकास के लिए खर्च नहीं होता था। ये शायद विश्व इतिहास में पहला विचित्र शासन था जो ग्रामीण जनता से राजस्व तो वसूलता था पर बदले में उनके कल्याण के लिए करता कुछ भी नहीं था। वैसे गांव के मुखिया की सलाह को स्थानीय प्रशासन एक हद तक महत्व देता था, जब तक वह सलाह उनके निहित स्वार्थों को नुक्सान न पहुंचाए। 
इन विषम परिस्थितयों में युवा ताराचंद गांव में मूल नागरिक सुविधाओं के विकास व् उनके रखरखाव के लिए एक स्थायी व्यवस्था चाहते थे। इसके लिए गांव वालों से सलाह मशविरा करके एक ५ उत्साही व्यक्तियों की एक स्थायी समिति बनायीं गयी तथा भविष्य में इसके कार्य निष्पादन हेतु आवश्यक खर्चों के लिए परस्पर चंदे से एक कोष भी स्थापित किया गया। ताराचंद की प्रेरणा से २-३ दिन में ही इस कोष के लिए चंदे के रूप में काफी धन इकठ्ठा हो गया। 

गांव के एक विकलांग युवक ने इसी वर्ष क़स्बा चरथावल के मिडल स्कूल से अपनी दृढ इच्छाशक्ति के बल पर मिडल पास किया था। इस युवक ने ताराचंद की प्रेरणा से एक और सहायक को साथ लेकर बहुत थोड़े मानदेय पर गांव में एक प्राइमरी स्कूल चलने की जिम्मेदारी ले ली। ४-५ दिन में ही करीब ५०-६० बच्चों ने प्राइमरी शिक्षा प्राप्त करने के लिए इस स्कूल में नामांकन करा लिया। युवा ताराचंद के लिए यह बहुत ही उत्साह वर्धक स्थिति थी। गांव में बुनियादी शिक्षा की व्यवस्था हो तथा कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे यह उनका वर्षों पुराना सपना था। यह सपना भविष्य में आशा से अधिक फलीभूत व् साकार हुआ। इस छोटे से स्कूल ने बिना किसी सरकारी मदद के बाद के वर्षों में गांव के युवकों को उस शिक्षा तक पहुँचाने व् अपने भविष्य को सफल बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभायी। 

Friday, February 19, 2016

14-गांव में बिताये कुछ अविस्मरणीय पल

अपने गांव के परिवार से कई बार आग्रह होने के कारण इंस्पेक्टर ताराचंद ने कुछ दिन की छुट्टी लेकर गांव जाने का मन बनाया। उनकी खुद की बहुत इच्छा थी कि अब एक अरसे बाद गांव जाकर कुछ दिन अपने परिवार के साथ बिताएं। इंस्पेक्टर ताराचंद ने नियमानुसार छुट्टी के लिए आवेदन किया जिसको कप्तान माइकल ने तुरंत ही स्वीकृत कर दिया। कप्तान माइकल ने वायरलेस पर सन्देश दिया मुझे ख़ुशी है की तुम अपने घर जा रहे हो, इस समय वाकई तुमको कुछ आराम की व् अपने परिवार के साथ समय बिताने की जरुरत है। इंस्पेक्टर ताराचंद ने तार द्वारा गांव में अपने आने की सूचना भिजवा दी और नियत दिन लगभग ११ बजे निकटवर्ती रेलवे स्टेशन रोहना खुर्द पहुँचने की सूचना दी और स्टेशन से गांव पहुँचने के लिए सवारी उपलब्ध कराने के प्रबन्ध करने को कहा। तार मिलते ही पूरे परिवार में ख़ुशी छा गयी। यह खबर थोड़ी देर में ही पूरे गांव में भी फ़ैल गयी। गांव के काफी लोगों ने परिवार से संपर्क करके अपनी ख़ुशी जाहिर की। इस समय गांव में केवल बैलगाड़ी ही आवागमन का प्रमुख साधन थी। गांव के अधिकांश लोगों ने परिवार से आग्रह किया की क्योंकि गांव के बेटे ने इस गांव का ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र का नाम रोशन किया है इसलिए २५ तारीख  को काफी लोग स्टेशन पहुँच कर ताराचंद का स्वागत करने जायेंगे। पिता चौधरी वजीर सिंह ने विनम्रता पूर्वक कहा " इतना सब करने की कोई जरुरत नहीं है जब लड़का गांव आ ही रहा है तो आप सबसे मिलना जुलना होगा ही।" चौधरी वजीर सिंह के विनम्र आग्रह के बावजूद काफी उत्साही लोगों ने विशेषकर युवाओं ने उस दिन स्टेशन पर पहुंचकर स्वागत करने का निर्णय किया।
२५  तारीख की सुबह ही लगभग ४० ग्रामवासी परिवार के सदस्यों के साथ ८-१० बैलगाड़ियों में सवार होकर स्टेशन जाने के लिए गांव से चल पड़े। गांव के बाल्मीकि समुदाय के लोग भी इस मौके को कहाँ चूकने वाले थे। गांव के बाहर १५-२० बाल्मीकियों का समूह पहले से ही उपस्थित था। उनमें से दो तीन ने आगे बढ़कर कुछ सकुचाते हुए बड़े भावपूर्ण शब्दों में चौधरी वजीर सिंह से आग्रह किया, बाबाजी यदि आप इजाजत दें तो हम भी अपने तीन चार ढोल लेकर ख़ुशी के इस मौके पर साथ चलें। शादी ब्याह की ख़ुशी के मौके पर तो हम रस्मी तौर पर ढोल बजाते ही हैं लेकिन ऐसे ख़ुशी के मौके भी बार बार कहाँ आते हैं। चौधरी साहब ने बड़े प्यार से उन्हें समझाया की अभी रहने दो, अब तो लड़का गांव में आ ही रहा है तब मिलना भी तथा खूब जी भरकर ख़ुशी प्रकट करना। चौधरी साहब के मना करने पर युवक मन मार कर रह गए। 
गांव घिस्सुखेड़ा से रोहाना कलां स्टेशन की दूरी लगभग १२ किलोमीटर है। इस पूरे कच्चे रस्ते पर तीन प्रमुख गांव पड़ते हैं, पहला गांव सैदपुर जो की ज्यादातर सैयद जमींदारों का है, दूसरा गांव बधाई कलां जिसमें ज्यादातर जाट व् ब्राह्मण कृषक परिवार रहते हैं, तीसरा स्टेशन से कुछ पहले ही गांव बहेड़ी जो बड़ा गांव है जिसमे त्यागी, ब्राह्मण व् अन्य जातियां रहती हैं। ८-१० बैलगाड़ियों का यह काफिला जब इन गांव से गुजरा तो लोगों ने जिज्ञासावश पूछा की क्या मामला है। पूरी बात पता लगने पर इन गांव के भी कुछ उत्साही और अच्छे परिचित व्यक्ति साथ हो लिए। इस प्रकार ५०-६० आदमियों का यह काफिला सुबह १० बजे से कुछ पहले ही स्टेशन पहुँच गया। 
स्टेशन इस समय लगभग सुनसान था तथा गाडी आने में भी काफी देर थी। स्टेशन मास्टर ने स्टेशन पर अचानक इतने लोगों की उपस्थिति व् उत्साह भरा नजारा देखा तो उसने इसका कारण जानना चाहा। पूरी बात पता लगने पर वो भी चहक उठे, उसने बताया की मैं ताराचंद जी से पूर्व में मिल चुका हूँ, मुझे यह भी पता है की उन्होंने पुलिस की नौकरी ज्वाइन कर ली हैं। सौभाग्य से मुझे भी आज आपकी इस ख़ुशी में शामिल होने का मौका मिल रहा है। स्टेशन मास्टर ने तुरंत ही स्टेशन पर उपलब्ध गेंदे के फूलों की कुछ माला बनवायी तथा अपने स्टाफ से कुछ मिठाई का प्रबंध करने को कहा। स्टेशन मास्टर ने स्टाफ को यह भी निर्देश दिया की गाडी के रुकने के समय को ३-४ मिनट के लिए बढ़ा दिया जाये। 
थोड़ी देर के बाद गाडी आने की पूर्व सूचना स्टेशन पर पहुंची। स्टेशन मास्टर ने फिर एक बार स्टाफ को आवश्यक निर्देश दिए। लोगों को एक एक पल का इन्तजार मुश्किल हो रहा था। आखिरकार नियत समय पर गाडी स्टेशन पहुंची और धीरे धीरे रेंगती हुई रुक गयी। 
गाडी रुकते ही ताराचंद डब्बे के दरवाजे पर आ गए। इस २-३ साल के अरसे ने युवा ताराचंद के व्यक्तित्व में बहुत बदलाव ला दिया था। कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी व साहस जैसे गुणों ने युवा ताराचंद के व्यक्तित्व को बहुत ही प्रभावशाली व् आकर्षक बना दिया था। ताराचंद को दरवाजे पर देखकर स्टेशन का माहौल जोश व् ख़ुशी से भर उठा। शुरू में यह स्थिति ताराचंद के लिए बहुत आश्चर्यचकित करने वाली थी लेकिन जल्दी ही वो सहज होकर इस माहौल का हिस्सा बन गए। स्वागत के इस अवसर पर स्टेशन पर उपस्थित सेंकडो लोगो की आँखें ख़ुशी व् गर्व से चमक रही थी। युवा ताराचंद के लिए इन चमकती आँखों में यह भेद करना असंभव था की इनमें कौन अपने परिवार का है तथा कौन अपने परिवार का नहीं है। सबके चेहरों व् आँखों में एक सामान गर्व व् अपनत्व का भाव था। यह अहसास ताराचंद के लिए अद्भुत व् बेहद प्रेरणादायक था। थोड़ी देर तक बधाई स्वीकार करने, बुजुर्गों से आशीर्वाद लेने व् अन्य से गले मिलने मिलाने का भावुक सिलसिला चलता रहा। इसके बाद स्टेशन मास्टर व् स्टाफ ने बड़े आग्रह पूर्वक सभी का मुँह मीठा कराया। ताराचंद ने स्टेशन मास्टर का भी गले मिलकर धन्यवाद किया तथा इजाजत चाही। थोड़ी देर बाद ही ये जोश से भरा काफिला गांव के लिए प्रस्थान कर गया। 
मैंने इंस्पेक्टर ताराचंद के गाँव आगमन व् भावपूर्ण स्वागत का वर्णन कुछ ज्यादा ही विस्तार से किया है। इसके पीछे मेरा उद्देश्य यह इंगित करना भी है की जहाँ समाज में एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों की संकुचित सोच व् देश तथा समाज के प्रति नकारात्मक क्रियाकलाप पूरे समाज में नफरत व् भेदभाव का माहौल पैदा कर देते हैं। दूसरी और मात्र एक व्यक्ति का ही सकारात्मक सोच व् समाज तथा देश के लिए किया गया उद्देश्यपूर्ण कार्य किस प्रकार आपसी भेदभाव व् मनमुटाव को भुला कर व्यक्तियों को प्रेम व् एकता के सूत्र में बाँध देता है। इस सामाजिक सिद्धांत को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने अपने चरित्र व् कार्य से बारबार स्थापित किया है। भारत के ही परिपेक्ष्य में राष्ट्रपिता के चरित्र व् कार्यशैली ने भारत के बेबस, डरे हुए, गुलामी की मानसिकता में जकड़े तथा भ्रमित समाज को एक नैतिक, निडर तथा उद्देश्य के लिए समर्पित समाज में बदल दिया। 

जोश से भरा यह काफिला गांव पहुंचा तो गांव से बाहर एक और अद्भुत नजारा था। २०-२५ बाल्मीकि अपने ढोलों के साथ गांव से बाहर पहले से ही उपस्थित थे। काफिले को देखते ही उन्होंने बड़े उत्साह से भंगड़ा अंदाज में थिरकते हुए ढोल बजाना शुरू कर दिया। बैलगाड़ियों से उतर कर अन्य लोगों ने भी उनकी ख़ुशी के इस इजहार में उत्साह के साथ शिरकत की। यह पूरा नजारा बड़ा अद्भुत तथा गांव में अपने प्रकार का पहली बार था। बाद में ताराचंद के बड़े भाई चौधरी कुंदन सिंह ने परंपरा के अनुसार अच्छे खासे इनाम से इन ढोलिओं को नवाज कर विदा क्या। गांव में युवा ताराचंद के शुरू के ३-४ दिन यूँ ही गहमा गहमी व् अन्य लोगों से मिलने मिलाने में निकल गए। इन दिनों में ताराचंद ने अपने बचपन के युवा साथियों के साथ पुरानी यादें साझा की तथा सभी युवा साथी उन सभी स्थानों पर जी भरकर घूमे जहाँ बचपन व् किशोरावस्था में गिल्ली डंडा व् कबड्डी जैसे खेल खेला करते थे। बड़े भाई कुंदन सिंह खुद घुड़सवारी के शौकीन थे तथा परिवार के पास एक बहुत अच्छी नस्ल का घोडा भी था। ताराचंद अपनी पुलिस ट्रैनिंग के दौरान तथा नौकरी के शुरू के दिनों में खूब घुड़सवारी कर चुके थे तथा इस कला में उन्हें महारत हासिल थी। अतः इन दिनों में ताराचंद ने अपने साथियों के घुड़सवारी का भी भरपूर आनंद लिया और साथियों को घुड़सवारी के बहुत से गुर सिखाये।  
बचपन के साथियों के आग्रह पर गांव के परंपरागत खेल कबड्डी के मैच का आयोजन भी रखा गया। स्वयं युवा ताराचंद ने इस आयोजन में उत्साह के साथ भाग लिया। यह आयोजन बहुत ही ज्यादा उत्साहवर्धक रहा। पूरा गांव ही आयोजन स्थल पर उमड़ पड़ा। अपने युवाओं की उमंग, जोश तथा खेल में उनके दांव पेंच देखकर गांव के बुजुर्ग भी उछल उछलकर उनका उत्साहवर्धन करते रहे। बुजुर्गों को लग रहा था जैसे वो भी अपनी जवानी के दिनों में पहुँच गए हों। मैच के बाद मिठाई और फल आदि वितरित किये गए। वास्तव में अपनी इन छुट्टियों का अपने लोगों के साथ भरपूर आनंद लेने तथा इन्हें अधिक से अधिक उपयोगी बनाने की पूरी रूपरेखा ताराचंद ने पहले ही तैयार कर रखी थी। इसी कड़ी में बच्चों के लिए भी खेलकूद व् अंताक्षरी आदि के अनेक कार्यक्रम रखे गए। बच्चों को अनेक छोटे छोटे आकर्षक उपहार देकर उनकी ख़ुशी व् उत्साह को कई गुना बढ़ा दिया गया। इस अवसर के लिए बालोपयोगी अनेक उपहार ताराचंद स्वयं अपने साथ लाये थे। गांव के बुजुर्ग ताराचंद की प्रशंशा करते उन्हें आशीर्वाद देते थक नहीं रहे थे। वो बार बार कहते थे की ताराचंद के आने से हमारे जीवन की संध्या बेला में भी जैसे बहार आ गयी। गांव का ठहरा हुआ व् एक हद तक नीरस जीवन बेहद उत्साह बी उमंग से भर उठा। 
इस काल में भारत के लाखों गांव की तरह गांव घिस्सुखेडा में भी जीवन के लिए आवश्यक मूलभूत सुविधाओं का पूरी तरह आभाव था। गांव में पानी के निकास तथा स्वच्छ्ता बनाये रखने के लिए कोई स्थायी प्रबंधन नहीं था। बुनयादी शिक्षा की भी कोई व्यवस्था निजी या शाशन स्तर पर नहीं थी। प्राइमरी स्कूल भी गांव से लगभग ५ किलोमीटर दूर क़स्बा चरथावल ही में था। सबसे बड़ी परेशानी यह थी की आमजन इन समस्याओं के प्रति उदासीन था तथा इसके निराकरण के लिए जिस सामुदायिक भावना या पहल की जरुरत थी वो गांव के जनमानस में विकसित ही नहीं हो पायी। गांव का कूड़ा कचरा तथा पशुओं का गोबर आदि जहाँ भी जगह मिलती डाल दिया जाता था। इससे मच्छर मक्खी तथा अन्य हानिकारक जीवाणुओं का प्रकोप बहुत ज्यादा बढ़ जाता था तथा वातावरण भी हर समय दूषित रहता था। इस अज्ञानता व् लापरवाही के चलते गांव के लोग विशेषकर बच्चे और औरतें आदि अनेक बीमारियों का शिकार होते रहते थे। बीमारियों के सही समय पर निदान और उनके उपचार की भी कोई सक्षम व्यवस्था नहीं थी। 

कई दिन के इस उत्सवपूर्ण माहौल के बाद ताराचंद ने पहले से तय अपने प्रोग्राम के अनुसार छुट्टियों के बाकी बचे सात आठ दिन इन समस्याओं के निराकरण के लिए प्रयत्न करने का निश्चय किया। 

Thursday, February 18, 2016

13-समसामयिक विवेचना तीसरा दशक

गांव के जीवन में एक बदलाव साफ़ नजर आने लगा था कि अशिक्षा के कारण जड़ता की स्थिति कुछ कुछ कम हो रही थी। गांव में संचार साधनों का तो पूरी तरह से अभाव था लेकिन राजनीतिक व् सामाजिक चेतना का प्रभाव व् प्रसार किसी न किसी माध्यम से गांव में प्रवेश करने लगा था। कुछ तो अशिक्षा के कारण और कुछ संचार व् आवागमन के साधन न होने के कारण आम ग्रामीण की जानकारी का दायरा बहुत सीमित था। अपने देश और दुनिया के बारे में जानकारी बहुत कम थी आम ग्रामवासी को बस इतना ही जानकारी थी कि भारत का राज्य सात समुन्दर पार बैठे अंग्रेज राजा के हाथ में है तथा दिल्ली में बैठा लाटसाहब भारत में उसके काम को देखता है। ये अज्ञान जहाँ एक तरफ उनकी बहुत बड़ी कमजोरी थी लेकिन दूसरी तरफ उनकी सरलता व् आत्मसंतुष्टि का बहुत बड़ा कारण भी था। जनमानस में परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। जिला मुख्यालय, नजदीक के बड़े कस्बों में भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस व् आर्यसमाज जैसी सामाजिक व् धार्मिक संस्थाओं द्वारा अनेक कार्यक्रम, जलसे सत्संग व् रैलियां आदि प्रायोजित किये जा रहे थे। कुछ ग्रामीण इन कार्यक्रमों में भाग भी लेने लगे थे और कुछ इन संस्थाओं के सक्रिय सदस्य बन गए थे। इन्हीं में से कुछ आगे बढ़कर इन संस्थाओं के साथ जुड़ गए तथा उनका पूरा जीवन उद्देश्य ही बदल गया। इन्होने अपना पूरा जीवन ही देश की आजादी को प्राप्त करने तथा एक नए भविष्य का निर्माण करने के लिए समर्पित कर दिया। इन्हीं सक्रिय लोगों के द्वारा देश में चल रहे राजनीतिक व् सांस्कृतिक घटनाक्रमों की जानकारी दूर देहात में दी जा रही थी तथा इसका व्यापक असर भी हो रहा था।
गांधीजी १९१८

दांडी यात्रा १९३०
गांधीजी तत्कालीन भारतीय राजनीति में एक अंधड़ की तरह छा गए थे। उनका उत्थान जनमानस के लिए एक शीतल व् सुखद वायु के झोंके की तरह था। उनके चमत्कारिक व्यक्तित्व एवं संदेशों ने लोक मानस को बेहद आंदोलित कर दिया था तथा एक नई व् विशिष्ट राजनीतिक चेतना उत्पन्न कर दी थी। जैसे जैसे इस नयी राजनीतिक चेतना का विस्तार सुदूर ग्रामीण अंचलों में फ़ैल रहा था लोगो की सोच का दायरा भी व्यापक होता जा रहा था। लोगों की अन्धविश्वास व् स्वार्थ से ग्रसित जड़ मानसिकता में नयी तरंगे उठ रही थी। आजादी अमूल्य है तथा इसे प्राप्त करने के लिए कोई भी त्याग व् कुरबानी कम है ये भावना निरंतर बढ़ती जा रही थी। साध्य की प्राप्ति के लिए साधनों की पवित्रता बनाये रखना तथा हर हालत में सत्य का अनुसरण, इसका मर्म लोग समझने लगे थे। गांधीजी का सत्य व् अहिंसा पर आधारित आंदोलन लोगों को व्यवहारिक व् आजादी प्राप्त करने का सर्वोत्तम उपाय लगने लगा था। 
लोगों में दमन का डर तथा उससे उत्पन्न बेबसी लगातार कम होने लगी थी। वैसे भी ये शाश्वत सत्य है की जब व्यक्ति सत्य के मार्ग पर अडिग होता है तो किसी भी प्रकार का डर या शंका का स्थान उसके जीवन में नहीं रहता। अब तक आम आदमी के फर्ज का दायरा बेहद सीमित था। केवल धन अर्जन करना व् अपने परिवार का पालन पोषण करना ही आम आदमी का मुख्य उद्देश्य था। लेकिन अब फर्ज के दायरे में राष्ट्र व् समाज के प्रति अपने दायित्व का भी प्रमुख स्थान हो गया। सामाजिक जीवन के इस बदलाव ने, बाद के वर्षों में, संयुक्त प्रान्त के इस अपेक्षाकृत पिछड़े पश्चिमांचल में भी अनेक स्वतंत्रता सेनानी पैदा किये। स्वतंत्रता सेनानियों की इस पौध ने विकसित होकर देश की आजादी के आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभायी।  
धार्मिक चेतना एवं धार्मिक विश्वासों में भी इस समय काफी सकारात्मक परिवर्तन हुए। लोगों के धार्मिक आचरण में भय से उत्पन अन्धविश्वास व् कुरीतियों का स्थान निरंतर काम होने लगा। धर्म का वास्तविक स्वरुप क्या है, उसका जीवन में क्या स्थान है इस विषय में लोग और अधिक समझदार व् जागरूक होने लगे। धर्म का वास्तविक उद्देश्य सत्य के प्रति निष्ठा तथा अपने व् समाज के प्रति मानवीय कर्तव्यों का पालन ही है, ये भावना विकसित हुयी। भारतीय सामाजिक जीवन में यह बदलाव बहुत ही सकारात्मक था तथा इसने आगे चलकर आजादी प्राप्त करने तथा नव राष्ट्र निर्माण में बहुत योगदान किया।

Monday, February 15, 2016

12- 1925 का वो भारतीय पुलिस पदक

तय समयानुसार २० मार्च को इलाहबाद पुलिस मुख्यालय पर एक भव्य समारोह में पदक प्रदान किये गए। इस अवसर पर मुख्य अतिथि गवर्नर के साथ साथ पुलिस विभाग के अन्य उच्चाधिकारी, मेयर इलाहबाद तथा अनेक गणमान्य नागरिक भी उपस्थित थे। इस बार संयुक्त प्रान्त पुलिस में केवल चार ही अधिकारीयों को यह सम्मान प्राप्त हुआ था। पुलिस पदक प्राप्त करने वालो में इंस्पेक्टर ताराचंद का पहला ही नंबर था। माइक पर अपने नाम की उद्घोषणा होने के बाद इंस्पेक्टर ताराचंद बहुत ही सधे हुए क़दमों से स्टेज पर पहुंचे। प्रोटोकॉल के अनुसार कप्तान माइकल को ही पदक प्राप्त करने से पहले अधिकारी की उपलब्धियों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करना था। कप्तान माइकल ने बड़े उत्साह पूर्वक बताया की संयुक्त प्रान्त के पुलिस विभाग में अब तक भारतीय पुलिस पदक का सम्मान प्राप्त करने वाले इंस्पेक्टर ताराचंद सबसे युवा अधिकारी हैं। वैसे तो पुलिस विभाग में किसी बड़े अपराध के उन्मूलन के लिए किये गए सफल अभियान के पीछे एक पूरी टीम का योगदान होता है लेकिन मैं ये दृढ़ता पूर्वक बताना चाहूंगा कि इंस्पेक्टर ताराचंद के नेतृत्व में अपराध उन्मूलन के जितने भी अभियानों में सफलता मिली है उसमें इस युवा अधिकारी के व्यक्तिगत साहस, कार्यकुशलता तथा ईमानदार प्रयासों की प्रमुख भूमिका है। अपनी पुलिस सेवा के संक्षिप्त कार्यकाल में इस युवा अधिकारी ने जो मिसाल कायम की है वो विभाग के अन्य सभी पुलिस कर्मियों के लिए अनुकरणीय है। संयुक्त प्रान्त के गवर्नर ने कप्तान माइकल की बातों को बड़े ध्यान से सुना तथा संज्ञान लिया। गवर्नर ने प्रोटोकॉल से हटकर पदक प्रदान करने के बाद युवा अधिकारी से गर्मजोशी से हाथ मिलाया तथा कंधे पर हाथ रखकर कहा "बहुत खूब मुझे तुम पर गर्व है, और आगे बढ़ो मेरी शुभकामनायें तुम्हारे साथ हैं। पूरा समारोह बहुत देर तक तालियों से गूंजता रहा। गांव घिस्सुखेड़ा में भी इंस्पेक्टर ताराचंद को यह सम्मान मिलने तथा उनकी उपलब्धियों की खबर पहले ही पहुँच चुकी थी। धीरे धीरे आसपास के गांव में भी खबर फ़ैल गयी। बहुत से लोग परिवार को बधाई देने व् अपनी ख़ुशी का इजहार करने आ रहे थे। गांव के बेटे की इस उपलब्धि पर गांव का प्रत्येक व्यक्ति फूला नहीं समा रहा था। प्रत्येक व्यक्ति आपसी भेदभाव भूलकर खुद को भी गौरवान्वित महसूस कर रहा था। 

इंस्पेक्टर ताराचंद पर भी बहुत दिनों से गांव आने का आग्रह बढ़ता जा रहा था। अपने परिवार वालो व् गांव वालों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए ताराचंद ने उनको तार द्वारा सूचित किया की कुछ आवश्यक कार्य निबटाने के बाद वो शीघ्र ही गांव आएंगे। 

गांव घिस्सुखेड़ा तथा आसपास के सभी गांव की हालत अब भी जस की तस थी। शिक्षा तथा स्वास्थ्य के विषय में अब भी कोई सुधार नहीं हुआ था। गांव के लगभग ९५ प्रतिशत लोग अब भी निरक्षर थे तथा सरकारी दस्तावेजों में हस्ताक्षर के बजाय उनके अंगूठों के निशान ही चलते थे। १०-१५ गांव के समूह में बिमारियों के इलाज व् किसी भी आक्समिक चिकित्सा के लिए पड़ोस के एक नजदीकी व् बड़े गांव कुटेसरा में केवल एक ही खानदानी हकीम साहब उपलब्ध थे। ये खानदान कई पीढ़ियों से हकीमयत कर रहा था। हकीम साहब का पूरा दवाखाना बटुए में उनकी जेब में रहता था। किसी भी बिमारी का निदान हकीम साहब नब्ज पढ़कर तथा पेशाब का रंग देखकर किया करते थे। ज्यादातर मामलों में कुछ ईश्वर की कृपा, मरीज की किस्मत और हकीम साहब की हकीमगिरी  की वजह से मरीज को फायदा हो ही जाता था। गांव वालों का हकीम साहब पर अटूट विश्वास था। या यूँ कहें की इलाज का कोई दूसरा विकल्प ही मौजूद नहीं था। वैसे भी उस समय गांव की फिजा में न तो वायु प्रदुषण था और न ही खाने पीने की वस्तुओं में मिलावट थी। लोगों की मानसिकता भी सरल तथा दुविधा मुक्त थी। ऐसे में बीमार पड़ने की सम्भावना वैसे ही कम हो जाती है। लोग यदि बीमार पड़ते भी थे तो या तो संक्रामक बीमारियों के कारण अथवा शादी ब्याह में अधिक व् बेमेल खाना खाने के कारण। संतुलित भोजन की पूर्ण जानकारी न होना भी बीमार होने का प्रमुख कारण था। वास्तव में तब गांव का जीवन बहुत ही नैसर्गिक था। कभी कभी आपसी स्वार्थों का टकराव या मूंछों की लड़ाई ही उनके लिए परेशानी का सबब बनती थी।