Friday, March 6, 2026

शहर में गांव

गाँव और शहर की बात करते-करते दर्पण अचानक मुस्कुरा दी। उसने देव की तरफ देखते हुए कहा,
देव, एक फर्क देखा है मैंने गाँव और शहर में। वैसे तो दोनों जगह चालाक और सीधे लोग मिल जाते हैं, लेकिन गाँव में एक सादापन अब भी बचा है। वहाँ अगर किसी को गुस्सा है तो सामने ही कह देगा,दो बात सुना देगा और फिर बात खत्म।
पर शहर में लोग दिल में ही भुनते रहते हैं। सामने मीठे, और पीठ पीछे बातें। पढ़े-लिखे शहरी लोग अपने भाव छिपाकर बड़े आराम से अभिनय कर लेते हैं, गाँव में तो लोग जो है, बस वही कह देते हैं।”
देव चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा।
दर्पण ने हल्की हँसी के साथ कहा
“लेकिन शहर में भी कुछ लोग तुम जैसे हैं, जो शहर में आकर भी दिल से ग्रामीण ही रहे। वही सादापन, वही साफ दिल। शायद इसी वजह से मैं तुम पर फिदा हो गई, क्योंकि तुममें गाँव की सच्चाई आज भी जिंदा है।”
थोड़ा रुककर उसने धीरे से कहा,
“दरअसल लोग गाँव से शहर तो आ गए, लेकिन कुछ ने अपने भीतर का गाँव बचाकर रखा। तुमने भी खुद को बचाकर रखा है, देव, क्योंकि यही तुम्हारा असली स्वभाव है।”
दर्पण ने उसकी आँखों में देखते हुए आख़िरी बात कही,
“तुम सागर हो, देव
 गहरे, अथाह, मगर संयत।
और मैं एक नदी हूँ,
जो हर पल तुम्हारी ओर बहती चली आती है,
तुम्हारी बाँहों में समाने के लिए।” 🌊

मनी ऑर्डर वाली होली

डाकिए ने धीरे से दरवाज़ा खटखटाया।
“चाचा, मनीऑर्डर आया है, शहर से।”
श्याम ने काँपते हाथों से रजिस्टर पर अंगूठा लगाया। लिफ़ाफ़ा खोला, अंदर वही पांच सौ के कुछ नोट थे। साथ में एक छोटी-सी पर्ची थी,
“होली मुबारक, पापा। इस बार आ नहीं पाऊँगा, साक्षी के एग्जाम हैं।”
उन्होंने धीरे से नोटों को मेज़ पर रखा और बाहर आँगन में आकर चारपाई पर बैठ गए। 
सामने वही कच्ची गली थी, 
जिस पर कभी उनका बेटा दौड़ता हुआ घर आता था। 
होली के दिन रंगों से भरा, हँसता हुआ।
मगर पिछले कुछ सालों से सब बदल गया था, 
बस एक मनीऑर्डर आता था कुछ शब्दों के साथ।
श्याम बुदबुदाए, 
जैसे बेटे से बात कर रहे हो,
“तुमसे तो कहा था मैंने, कि पैसे मत भेजा करो, ये नहीं चाहिएं मुझे, 
और न ही तुम्हारा भेजा हुआ प्यार।
बस तुम्हारा साथ चाहिए, वो हाथ चाहिए जो मेरे झुकते कंधों पर टिक जाए।”
उन्होंने एक गहरी साँस ली।
“सुनो बेटा,
अब मैं उतना नहीं चल पाता कि तुम्हें ढूँढने शहर आ सकूँ,
और उतना झुक भी नहीं पाता कि बचपन की तरह तुम्हारे चेहरे को पास से देख सकूँ।”
उसकी बूढ़ी आँखें फिर उसी रास्ते पर टिक गईं।
“बस इसीलिए थोड़ा सा तुमसे नाराज़ हूँ,
होली के रंग अगर तुम्हारे हाथों से आते,
तो शायद इन सूनी आँखों में भी थोड़ा रंग उतर आता।”
मेज़ पर रखे गुलाबी नोट हवा से हल्के-हल्के हिल रहे थे।
पर आँगन में फिर भी रंग नहीं था।

Tuesday, March 3, 2026

एक सवाल, एक इंतज़ार

मार्च की ढलती शाम थी।
सूखी झील के किनारे, हाथों में हाथ लिए उसने धीरे से पूछा,
“फिर कब मिलोगी?”
वह थोड़ी देर आसमान की ओर देखती रही,
फिर मुस्कुरा कर बोली,
“जब सितारे चाहेंगे… तब।”
दिन बीत गए, मौसम बदल गए,
पर वह आज भी हर रात आसमान में,
उन सितारों की रजामंदी का इंतज़ार करता है। ✨