Friday, February 19, 2016

14-गांव में बिताये कुछ अविस्मरणीय पल

अपने गांव के परिवार से कई बार आग्रह होने के कारण इंस्पेक्टर ताराचंद ने कुछ दिन की छुट्टी लेकर गांव जाने का मन बनाया। उनकी खुद की बहुत इच्छा थी कि अब एक अरसे बाद गांव जाकर कुछ दिन अपने परिवार के साथ बिताएं। इंस्पेक्टर ताराचंद ने नियमानुसार छुट्टी के लिए आवेदन किया जिसको कप्तान माइकल ने तुरंत ही स्वीकृत कर दिया। कप्तान माइकल ने वायरलेस पर सन्देश दिया मुझे ख़ुशी है की तुम अपने घर जा रहे हो, इस समय वाकई तुमको कुछ आराम की व् अपने परिवार के साथ समय बिताने की जरुरत है। इंस्पेक्टर ताराचंद ने तार द्वारा गांव में अपने आने की सूचना भिजवा दी और नियत दिन लगभग ११ बजे निकटवर्ती रेलवे स्टेशन रोहना खुर्द पहुँचने की सूचना दी और स्टेशन से गांव पहुँचने के लिए सवारी उपलब्ध कराने के प्रबन्ध करने को कहा। तार मिलते ही पूरे परिवार में ख़ुशी छा गयी। यह खबर थोड़ी देर में ही पूरे गांव में भी फ़ैल गयी। गांव के काफी लोगों ने परिवार से संपर्क करके अपनी ख़ुशी जाहिर की। इस समय गांव में केवल बैलगाड़ी ही आवागमन का प्रमुख साधन थी। गांव के अधिकांश लोगों ने परिवार से आग्रह किया की क्योंकि गांव के बेटे ने इस गांव का ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र का नाम रोशन किया है इसलिए २५ तारीख  को काफी लोग स्टेशन पहुँच कर ताराचंद का स्वागत करने जायेंगे। पिता चौधरी वजीर सिंह ने विनम्रता पूर्वक कहा " इतना सब करने की कोई जरुरत नहीं है जब लड़का गांव आ ही रहा है तो आप सबसे मिलना जुलना होगा ही।" चौधरी वजीर सिंह के विनम्र आग्रह के बावजूद काफी उत्साही लोगों ने विशेषकर युवाओं ने उस दिन स्टेशन पर पहुंचकर स्वागत करने का निर्णय किया।
२५  तारीख की सुबह ही लगभग ४० ग्रामवासी परिवार के सदस्यों के साथ ८-१० बैलगाड़ियों में सवार होकर स्टेशन जाने के लिए गांव से चल पड़े। गांव के बाल्मीकि समुदाय के लोग भी इस मौके को कहाँ चूकने वाले थे। गांव के बाहर १५-२० बाल्मीकियों का समूह पहले से ही उपस्थित था। उनमें से दो तीन ने आगे बढ़कर कुछ सकुचाते हुए बड़े भावपूर्ण शब्दों में चौधरी वजीर सिंह से आग्रह किया, बाबाजी यदि आप इजाजत दें तो हम भी अपने तीन चार ढोल लेकर ख़ुशी के इस मौके पर साथ चलें। शादी ब्याह की ख़ुशी के मौके पर तो हम रस्मी तौर पर ढोल बजाते ही हैं लेकिन ऐसे ख़ुशी के मौके भी बार बार कहाँ आते हैं। चौधरी साहब ने बड़े प्यार से उन्हें समझाया की अभी रहने दो, अब तो लड़का गांव में आ ही रहा है तब मिलना भी तथा खूब जी भरकर ख़ुशी प्रकट करना। चौधरी साहब के मना करने पर युवक मन मार कर रह गए। 
गांव घिस्सुखेड़ा से रोहाना कलां स्टेशन की दूरी लगभग १२ किलोमीटर है। इस पूरे कच्चे रस्ते पर तीन प्रमुख गांव पड़ते हैं, पहला गांव सैदपुर जो की ज्यादातर सैयद जमींदारों का है, दूसरा गांव बधाई कलां जिसमें ज्यादातर जाट व् ब्राह्मण कृषक परिवार रहते हैं, तीसरा स्टेशन से कुछ पहले ही गांव बहेड़ी जो बड़ा गांव है जिसमे त्यागी, ब्राह्मण व् अन्य जातियां रहती हैं। ८-१० बैलगाड़ियों का यह काफिला जब इन गांव से गुजरा तो लोगों ने जिज्ञासावश पूछा की क्या मामला है। पूरी बात पता लगने पर इन गांव के भी कुछ उत्साही और अच्छे परिचित व्यक्ति साथ हो लिए। इस प्रकार ५०-६० आदमियों का यह काफिला सुबह १० बजे से कुछ पहले ही स्टेशन पहुँच गया। 
स्टेशन इस समय लगभग सुनसान था तथा गाडी आने में भी काफी देर थी। स्टेशन मास्टर ने स्टेशन पर अचानक इतने लोगों की उपस्थिति व् उत्साह भरा नजारा देखा तो उसने इसका कारण जानना चाहा। पूरी बात पता लगने पर वो भी चहक उठे, उसने बताया की मैं ताराचंद जी से पूर्व में मिल चुका हूँ, मुझे यह भी पता है की उन्होंने पुलिस की नौकरी ज्वाइन कर ली हैं। सौभाग्य से मुझे भी आज आपकी इस ख़ुशी में शामिल होने का मौका मिल रहा है। स्टेशन मास्टर ने तुरंत ही स्टेशन पर उपलब्ध गेंदे के फूलों की कुछ माला बनवायी तथा अपने स्टाफ से कुछ मिठाई का प्रबंध करने को कहा। स्टेशन मास्टर ने स्टाफ को यह भी निर्देश दिया की गाडी के रुकने के समय को ३-४ मिनट के लिए बढ़ा दिया जाये। 
थोड़ी देर के बाद गाडी आने की पूर्व सूचना स्टेशन पर पहुंची। स्टेशन मास्टर ने फिर एक बार स्टाफ को आवश्यक निर्देश दिए। लोगों को एक एक पल का इन्तजार मुश्किल हो रहा था। आखिरकार नियत समय पर गाडी स्टेशन पहुंची और धीरे धीरे रेंगती हुई रुक गयी। 
गाडी रुकते ही ताराचंद डब्बे के दरवाजे पर आ गए। इस २-३ साल के अरसे ने युवा ताराचंद के व्यक्तित्व में बहुत बदलाव ला दिया था। कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी व साहस जैसे गुणों ने युवा ताराचंद के व्यक्तित्व को बहुत ही प्रभावशाली व् आकर्षक बना दिया था। ताराचंद को दरवाजे पर देखकर स्टेशन का माहौल जोश व् ख़ुशी से भर उठा। शुरू में यह स्थिति ताराचंद के लिए बहुत आश्चर्यचकित करने वाली थी लेकिन जल्दी ही वो सहज होकर इस माहौल का हिस्सा बन गए। स्वागत के इस अवसर पर स्टेशन पर उपस्थित सेंकडो लोगो की आँखें ख़ुशी व् गर्व से चमक रही थी। युवा ताराचंद के लिए इन चमकती आँखों में यह भेद करना असंभव था की इनमें कौन अपने परिवार का है तथा कौन अपने परिवार का नहीं है। सबके चेहरों व् आँखों में एक सामान गर्व व् अपनत्व का भाव था। यह अहसास ताराचंद के लिए अद्भुत व् बेहद प्रेरणादायक था। थोड़ी देर तक बधाई स्वीकार करने, बुजुर्गों से आशीर्वाद लेने व् अन्य से गले मिलने मिलाने का भावुक सिलसिला चलता रहा। इसके बाद स्टेशन मास्टर व् स्टाफ ने बड़े आग्रह पूर्वक सभी का मुँह मीठा कराया। ताराचंद ने स्टेशन मास्टर का भी गले मिलकर धन्यवाद किया तथा इजाजत चाही। थोड़ी देर बाद ही ये जोश से भरा काफिला गांव के लिए प्रस्थान कर गया। 
मैंने इंस्पेक्टर ताराचंद के गाँव आगमन व् भावपूर्ण स्वागत का वर्णन कुछ ज्यादा ही विस्तार से किया है। इसके पीछे मेरा उद्देश्य यह इंगित करना भी है की जहाँ समाज में एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों की संकुचित सोच व् देश तथा समाज के प्रति नकारात्मक क्रियाकलाप पूरे समाज में नफरत व् भेदभाव का माहौल पैदा कर देते हैं। दूसरी और मात्र एक व्यक्ति का ही सकारात्मक सोच व् समाज तथा देश के लिए किया गया उद्देश्यपूर्ण कार्य किस प्रकार आपसी भेदभाव व् मनमुटाव को भुला कर व्यक्तियों को प्रेम व् एकता के सूत्र में बाँध देता है। इस सामाजिक सिद्धांत को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने अपने चरित्र व् कार्य से बारबार स्थापित किया है। भारत के ही परिपेक्ष्य में राष्ट्रपिता के चरित्र व् कार्यशैली ने भारत के बेबस, डरे हुए, गुलामी की मानसिकता में जकड़े तथा भ्रमित समाज को एक नैतिक, निडर तथा उद्देश्य के लिए समर्पित समाज में बदल दिया। 

जोश से भरा यह काफिला गांव पहुंचा तो गांव से बाहर एक और अद्भुत नजारा था। २०-२५ बाल्मीकि अपने ढोलों के साथ गांव से बाहर पहले से ही उपस्थित थे। काफिले को देखते ही उन्होंने बड़े उत्साह से भंगड़ा अंदाज में थिरकते हुए ढोल बजाना शुरू कर दिया। बैलगाड़ियों से उतर कर अन्य लोगों ने भी उनकी ख़ुशी के इस इजहार में उत्साह के साथ शिरकत की। यह पूरा नजारा बड़ा अद्भुत तथा गांव में अपने प्रकार का पहली बार था। बाद में ताराचंद के बड़े भाई चौधरी कुंदन सिंह ने परंपरा के अनुसार अच्छे खासे इनाम से इन ढोलिओं को नवाज कर विदा क्या। गांव में युवा ताराचंद के शुरू के ३-४ दिन यूँ ही गहमा गहमी व् अन्य लोगों से मिलने मिलाने में निकल गए। इन दिनों में ताराचंद ने अपने बचपन के युवा साथियों के साथ पुरानी यादें साझा की तथा सभी युवा साथी उन सभी स्थानों पर जी भरकर घूमे जहाँ बचपन व् किशोरावस्था में गिल्ली डंडा व् कबड्डी जैसे खेल खेला करते थे। बड़े भाई कुंदन सिंह खुद घुड़सवारी के शौकीन थे तथा परिवार के पास एक बहुत अच्छी नस्ल का घोडा भी था। ताराचंद अपनी पुलिस ट्रैनिंग के दौरान तथा नौकरी के शुरू के दिनों में खूब घुड़सवारी कर चुके थे तथा इस कला में उन्हें महारत हासिल थी। अतः इन दिनों में ताराचंद ने अपने साथियों के घुड़सवारी का भी भरपूर आनंद लिया और साथियों को घुड़सवारी के बहुत से गुर सिखाये।  
बचपन के साथियों के आग्रह पर गांव के परंपरागत खेल कबड्डी के मैच का आयोजन भी रखा गया। स्वयं युवा ताराचंद ने इस आयोजन में उत्साह के साथ भाग लिया। यह आयोजन बहुत ही ज्यादा उत्साहवर्धक रहा। पूरा गांव ही आयोजन स्थल पर उमड़ पड़ा। अपने युवाओं की उमंग, जोश तथा खेल में उनके दांव पेंच देखकर गांव के बुजुर्ग भी उछल उछलकर उनका उत्साहवर्धन करते रहे। बुजुर्गों को लग रहा था जैसे वो भी अपनी जवानी के दिनों में पहुँच गए हों। मैच के बाद मिठाई और फल आदि वितरित किये गए। वास्तव में अपनी इन छुट्टियों का अपने लोगों के साथ भरपूर आनंद लेने तथा इन्हें अधिक से अधिक उपयोगी बनाने की पूरी रूपरेखा ताराचंद ने पहले ही तैयार कर रखी थी। इसी कड़ी में बच्चों के लिए भी खेलकूद व् अंताक्षरी आदि के अनेक कार्यक्रम रखे गए। बच्चों को अनेक छोटे छोटे आकर्षक उपहार देकर उनकी ख़ुशी व् उत्साह को कई गुना बढ़ा दिया गया। इस अवसर के लिए बालोपयोगी अनेक उपहार ताराचंद स्वयं अपने साथ लाये थे। गांव के बुजुर्ग ताराचंद की प्रशंशा करते उन्हें आशीर्वाद देते थक नहीं रहे थे। वो बार बार कहते थे की ताराचंद के आने से हमारे जीवन की संध्या बेला में भी जैसे बहार आ गयी। गांव का ठहरा हुआ व् एक हद तक नीरस जीवन बेहद उत्साह बी उमंग से भर उठा। 
इस काल में भारत के लाखों गांव की तरह गांव घिस्सुखेडा में भी जीवन के लिए आवश्यक मूलभूत सुविधाओं का पूरी तरह आभाव था। गांव में पानी के निकास तथा स्वच्छ्ता बनाये रखने के लिए कोई स्थायी प्रबंधन नहीं था। बुनयादी शिक्षा की भी कोई व्यवस्था निजी या शाशन स्तर पर नहीं थी। प्राइमरी स्कूल भी गांव से लगभग ५ किलोमीटर दूर क़स्बा चरथावल ही में था। सबसे बड़ी परेशानी यह थी की आमजन इन समस्याओं के प्रति उदासीन था तथा इसके निराकरण के लिए जिस सामुदायिक भावना या पहल की जरुरत थी वो गांव के जनमानस में विकसित ही नहीं हो पायी। गांव का कूड़ा कचरा तथा पशुओं का गोबर आदि जहाँ भी जगह मिलती डाल दिया जाता था। इससे मच्छर मक्खी तथा अन्य हानिकारक जीवाणुओं का प्रकोप बहुत ज्यादा बढ़ जाता था तथा वातावरण भी हर समय दूषित रहता था। इस अज्ञानता व् लापरवाही के चलते गांव के लोग विशेषकर बच्चे और औरतें आदि अनेक बीमारियों का शिकार होते रहते थे। बीमारियों के सही समय पर निदान और उनके उपचार की भी कोई सक्षम व्यवस्था नहीं थी। 

कई दिन के इस उत्सवपूर्ण माहौल के बाद ताराचंद ने पहले से तय अपने प्रोग्राम के अनुसार छुट्टियों के बाकी बचे सात आठ दिन इन समस्याओं के निराकरण के लिए प्रयत्न करने का निश्चय किया। 

3 comments:

  1. अच्छा जा रहे हो । कहीं कहीं टंकण में त्रुटि हो रही हैं जैसे सूचना युवक आदि ।

    ReplyDelete