Monday, February 29, 2016

16-ग्राम समिति की अवधारणा

जहाँ तक सफाई व्यवस्था का प्रबंध था समिति की देख रेख में गांव के बाहर पड़ी बंजर भूमि में कम्पोस्ट खाद तैयार करने के लिए सेंकडों गड्ढे बनवाए गए। प्रत्येक परिवार को उसकी आवश्यकता के अनुसार गड्ढे बाँट दिए गए। गांव का हर प्रकार का कूड़ा कचरा व् पशुओं का मल मूत्र आदि इन गड्ढो में ही डालना अनिवार्य किया गया। इस कार्यक्रम की सफलता से दोहरे उद्देश्य की प्राप्ति होने वाली थी। एक तरफ गांव में साफ़ सफाई की स्थायी व्यवस्था हुयी दूसरी और तैयार कम्पोस्ट से खेती की उपज बढ़ना तय था। 
युवक ताराचंद के निस्वार्थ व् ईमानदार प्रयासों से गांव का वातावरण बेहद प्रेरणादायक व् गतिशील हो गया। बाल्मीकि युवक भी इन प्रयासों में अपना योगदान देने को बेहद उत्सुक थे। अनेक बाल्मीकि युवकों ने बिना किसी पारिश्रमिक के गांव की नियमित सफाई करने की अपनी प्रबल इच्छा जताई। इस प्रस्ताव का सभी गांव वालो ने बेहद स्वागत किया। तय हुआ की समिति सफाई के लिए इनमें से तीन युवकों की सेवाएं ले तथा अपने स्थायी कोष से इन युवकों को आवश्यक मानदेय देती रहे। 
इन सभी कार्यक्रमों को निरंतर चलाते रहने के लिए गांव समिति के कोष में धन का नियमित प्रवाह बनाये रखना आवश्यक था। इसके लिए गांव के प्रत्येक परिवार को सालाना चंदे के रूप में अपनी जोत के अनुरूप निश्चित धन समिति के कोष में देना था। यह भी तय हुआ की शादी ब्याह व् अन्य उत्सवों के मौके पर सम्बंधित परिवार अपनी इच्छा व् भावना के अनुरूप कुछ न कुछ धन गांव समिति के कोष के लिए देंगे। 
गांव घिस्सुखेड़ा में चल रहे इस उत्साही घटनाक्रम की सूचना क्षेत्र के अनेक गांवो में भी पहुँच रही थी। युवा ताराचंद ने स्वयं भी समिति के सदस्यों के साथ समय निकाल कर इन गांव में संपर्क किया। इस प्रकार क्षेत्र के इन गांव में भी इस कार्यक्रम को अपनाने का उत्साह पैदा हो गया। इन गांव में भी इसी तर्ज पर गांव समिति गठित होने लगी। बाद के वर्षों में इस पूरे कार्यक्रम ने बहुत ही सकारात्मक व् उत्साहजनक परिणाम दिए। ऊपर से देखने पर यह पूरा घटनाक्रम बहुत ही छोटा व् सीमित लगता है लेकिन लम्बे परिपेक्ष्य में यह भविष्य में क्रियान्वित व् सफल होने वाले सहकारिता आंदोलन का उस समय के हिसाब से एक बेहतरीन व् अनूठा प्रारंभिक मॉडल था। 
युवा ताराचंद को गांव आये हुए १०-१२ दिन हो चुके थे। आज उनको कप्तान माइकल का व्यक्तिगत तार मिला जिसमें कप्तान ने यह आशा व्यक्त की, कि तुम्हारी छुटियाँ बहुत सुखद बीत रही होंगी और यदि कुछ और छुट्टियां बढ़ाना चाहते हो तो तुरंत तार द्वारा सूचित करो। आज ताराचंद जी ने अपने नजदीकी शहर जाने का मन बनाया। सबसे पहले उन्होंने पुलिस कोतवाली पहुँच कर वायरलेस द्वारा कप्तान माइकल का धन्यवाद किया तथा बताया कि और छुट्टियों की आवश्यकता नहीं है और वो समय पर पहुँच रहे हैं। इसके बाद युवा ताराचंद ने अपने कुछ पुराने साथियों से मिलने तथा पुरानी यादें ताजा करने का मन बनाया। इनमें से कुछ आजादी के राष्ट्रिय आंदोलन में सक्रिय भाग ले रहे थे जिनमें केशो दास गुप्ता व् सुमत प्रसाद जैन आदि प्रमुख थे। आजादी के बाद में केशो दास गुप्ता मुजफ्फरनगर से विधायक चुने गए तथा सुमत प्रसाद जैन भारतीय संसद के लिए इस क्षेत्र से संसद सदस्य चुने गए। कुछ और साथी अपना व्यवसाय संभाल रहे थे तथा कुछ नौकरी के सिलसिले में इधर उधर नियुक्त हो चुके थे। 

Friday, February 26, 2016

15-सामाजिक सुधार 1925-26

सन १९२५-२६ के इस दौर में भारत में ब्रिटिश शासन पूरी मजबूती के साथ कायम था। धुरी राष्ट्रों के खिलाफ निर्णायक प्रथम विश्वयुद्ध जीतने के बाद अंग्रेजों का मिजाज वैसे ही चढ़ा हुआ था। इंग्लैंड की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं पूरे उफान पर थी। इस समय ब्रिटिश शासक वर्ग का मूल उद्देश्य हर प्रकार के हथकंडे अपनाकर भारत में राष्ट्रिय आंदोलन को नाकाम करना तथा अपने शासन को और मजबूत बनाये रखना था। भारत के प्रचुर प्राकर्तिक संसाधनों तथा आसानी से उपलब्ध मानव श्रम का शोषण व् उपयोग करके इंग्लैंड की आर्थिक सत्ता को और भी मजबूत करना था। इंग्लैंड के अनावश्यक ओद्यौगिक उत्पादों को खपाने के लिए भारत मात्र एक सुलभ बाजार था। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में नागरिक सुविधाओं के विस्तार तथा जनकल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वन शासन के योजनागत एजेंडा में ही नहीं था। यही कारण था की इस काल में भारत के लगभग ५-६ लाख गांव में स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छ्ता तथा परिवहन की स्थिति बहुत बुरी थी। 
इस समय भारत के ५-६ लाख गांव में आज की तरह गांव पंचायतें नहीं थी और न ही आज की तरह पंचायती राज व्यवस्था का कोई और रूप विद्यमान था। गांव में नागरिक सुविधाओं की स्थापना व् सक्षम संचालन के लिए किसी भी स्तर पर शासन द्वारा नियुक्त कोई अन्य संस्था भी सक्रिय नहीं थी। इस समय गांव में शासन द्वारा नियुक्त एक मुखिया होता था जो गांव का ही कोई बुजुर्ग निवासी होता था। मुखिया का भी गांव के विकास व् नागरिक सुविधाओं से कोई लेना देना नहीं था। 
ब्रिटिश शासन में एक गांव का स्टेटस भूराजस्व वसूलने की एक छोटी इकाई मात्र था। यह राजस्व मालगुजारी व् भू-लगान के रूप में अनिवार्य रूप से प्रत्येक गांव से वसूला जाता था। शासन द्वारा यह लगान वसूल करने के लिए तथा उसे जिला कोष में जमा करने के लिए पटवारी व् अमीन की स्थायी नियुक्ति की जाती थी। मुखिया का भी मुख्य काम इस राजस्व वसूली में पटवारी व् अमीन आदि की मदद करना ही था। इस लगान का कोई भी हिस्सा गांव के विकास के लिए खर्च नहीं होता था। ये शायद विश्व इतिहास में पहला विचित्र शासन था जो ग्रामीण जनता से राजस्व तो वसूलता था पर बदले में उनके कल्याण के लिए करता कुछ भी नहीं था। वैसे गांव के मुखिया की सलाह को स्थानीय प्रशासन एक हद तक महत्व देता था, जब तक वह सलाह उनके निहित स्वार्थों को नुक्सान न पहुंचाए। 
इन विषम परिस्थितयों में युवा ताराचंद गांव में मूल नागरिक सुविधाओं के विकास व् उनके रखरखाव के लिए एक स्थायी व्यवस्था चाहते थे। इसके लिए गांव वालों से सलाह मशविरा करके एक ५ उत्साही व्यक्तियों की एक स्थायी समिति बनायीं गयी तथा भविष्य में इसके कार्य निष्पादन हेतु आवश्यक खर्चों के लिए परस्पर चंदे से एक कोष भी स्थापित किया गया। ताराचंद की प्रेरणा से २-३ दिन में ही इस कोष के लिए चंदे के रूप में काफी धन इकठ्ठा हो गया। 

गांव के एक विकलांग युवक ने इसी वर्ष क़स्बा चरथावल के मिडल स्कूल से अपनी दृढ इच्छाशक्ति के बल पर मिडल पास किया था। इस युवक ने ताराचंद की प्रेरणा से एक और सहायक को साथ लेकर बहुत थोड़े मानदेय पर गांव में एक प्राइमरी स्कूल चलने की जिम्मेदारी ले ली। ४-५ दिन में ही करीब ५०-६० बच्चों ने प्राइमरी शिक्षा प्राप्त करने के लिए इस स्कूल में नामांकन करा लिया। युवा ताराचंद के लिए यह बहुत ही उत्साह वर्धक स्थिति थी। गांव में बुनियादी शिक्षा की व्यवस्था हो तथा कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे यह उनका वर्षों पुराना सपना था। यह सपना भविष्य में आशा से अधिक फलीभूत व् साकार हुआ। इस छोटे से स्कूल ने बिना किसी सरकारी मदद के बाद के वर्षों में गांव के युवकों को उस शिक्षा तक पहुँचाने व् अपने भविष्य को सफल बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभायी। 

Friday, February 19, 2016

14-गांव में बिताये कुछ अविस्मरणीय पल

अपने गांव के परिवार से कई बार आग्रह होने के कारण इंस्पेक्टर ताराचंद ने कुछ दिन की छुट्टी लेकर गांव जाने का मन बनाया। उनकी खुद की बहुत इच्छा थी कि अब एक अरसे बाद गांव जाकर कुछ दिन अपने परिवार के साथ बिताएं। इंस्पेक्टर ताराचंद ने नियमानुसार छुट्टी के लिए आवेदन किया जिसको कप्तान माइकल ने तुरंत ही स्वीकृत कर दिया। कप्तान माइकल ने वायरलेस पर सन्देश दिया मुझे ख़ुशी है की तुम अपने घर जा रहे हो, इस समय वाकई तुमको कुछ आराम की व् अपने परिवार के साथ समय बिताने की जरुरत है। इंस्पेक्टर ताराचंद ने तार द्वारा गांव में अपने आने की सूचना भिजवा दी और नियत दिन लगभग ११ बजे निकटवर्ती रेलवे स्टेशन रोहना खुर्द पहुँचने की सूचना दी और स्टेशन से गांव पहुँचने के लिए सवारी उपलब्ध कराने के प्रबन्ध करने को कहा। तार मिलते ही पूरे परिवार में ख़ुशी छा गयी। यह खबर थोड़ी देर में ही पूरे गांव में भी फ़ैल गयी। गांव के काफी लोगों ने परिवार से संपर्क करके अपनी ख़ुशी जाहिर की। इस समय गांव में केवल बैलगाड़ी ही आवागमन का प्रमुख साधन थी। गांव के अधिकांश लोगों ने परिवार से आग्रह किया की क्योंकि गांव के बेटे ने इस गांव का ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र का नाम रोशन किया है इसलिए २५ तारीख  को काफी लोग स्टेशन पहुँच कर ताराचंद का स्वागत करने जायेंगे। पिता चौधरी वजीर सिंह ने विनम्रता पूर्वक कहा " इतना सब करने की कोई जरुरत नहीं है जब लड़का गांव आ ही रहा है तो आप सबसे मिलना जुलना होगा ही।" चौधरी वजीर सिंह के विनम्र आग्रह के बावजूद काफी उत्साही लोगों ने विशेषकर युवाओं ने उस दिन स्टेशन पर पहुंचकर स्वागत करने का निर्णय किया।
२५  तारीख की सुबह ही लगभग ४० ग्रामवासी परिवार के सदस्यों के साथ ८-१० बैलगाड़ियों में सवार होकर स्टेशन जाने के लिए गांव से चल पड़े। गांव के बाल्मीकि समुदाय के लोग भी इस मौके को कहाँ चूकने वाले थे। गांव के बाहर १५-२० बाल्मीकियों का समूह पहले से ही उपस्थित था। उनमें से दो तीन ने आगे बढ़कर कुछ सकुचाते हुए बड़े भावपूर्ण शब्दों में चौधरी वजीर सिंह से आग्रह किया, बाबाजी यदि आप इजाजत दें तो हम भी अपने तीन चार ढोल लेकर ख़ुशी के इस मौके पर साथ चलें। शादी ब्याह की ख़ुशी के मौके पर तो हम रस्मी तौर पर ढोल बजाते ही हैं लेकिन ऐसे ख़ुशी के मौके भी बार बार कहाँ आते हैं। चौधरी साहब ने बड़े प्यार से उन्हें समझाया की अभी रहने दो, अब तो लड़का गांव में आ ही रहा है तब मिलना भी तथा खूब जी भरकर ख़ुशी प्रकट करना। चौधरी साहब के मना करने पर युवक मन मार कर रह गए। 
गांव घिस्सुखेड़ा से रोहाना कलां स्टेशन की दूरी लगभग १२ किलोमीटर है। इस पूरे कच्चे रस्ते पर तीन प्रमुख गांव पड़ते हैं, पहला गांव सैदपुर जो की ज्यादातर सैयद जमींदारों का है, दूसरा गांव बधाई कलां जिसमें ज्यादातर जाट व् ब्राह्मण कृषक परिवार रहते हैं, तीसरा स्टेशन से कुछ पहले ही गांव बहेड़ी जो बड़ा गांव है जिसमे त्यागी, ब्राह्मण व् अन्य जातियां रहती हैं। ८-१० बैलगाड़ियों का यह काफिला जब इन गांव से गुजरा तो लोगों ने जिज्ञासावश पूछा की क्या मामला है। पूरी बात पता लगने पर इन गांव के भी कुछ उत्साही और अच्छे परिचित व्यक्ति साथ हो लिए। इस प्रकार ५०-६० आदमियों का यह काफिला सुबह १० बजे से कुछ पहले ही स्टेशन पहुँच गया। 
स्टेशन इस समय लगभग सुनसान था तथा गाडी आने में भी काफी देर थी। स्टेशन मास्टर ने स्टेशन पर अचानक इतने लोगों की उपस्थिति व् उत्साह भरा नजारा देखा तो उसने इसका कारण जानना चाहा। पूरी बात पता लगने पर वो भी चहक उठे, उसने बताया की मैं ताराचंद जी से पूर्व में मिल चुका हूँ, मुझे यह भी पता है की उन्होंने पुलिस की नौकरी ज्वाइन कर ली हैं। सौभाग्य से मुझे भी आज आपकी इस ख़ुशी में शामिल होने का मौका मिल रहा है। स्टेशन मास्टर ने तुरंत ही स्टेशन पर उपलब्ध गेंदे के फूलों की कुछ माला बनवायी तथा अपने स्टाफ से कुछ मिठाई का प्रबंध करने को कहा। स्टेशन मास्टर ने स्टाफ को यह भी निर्देश दिया की गाडी के रुकने के समय को ३-४ मिनट के लिए बढ़ा दिया जाये। 
थोड़ी देर के बाद गाडी आने की पूर्व सूचना स्टेशन पर पहुंची। स्टेशन मास्टर ने फिर एक बार स्टाफ को आवश्यक निर्देश दिए। लोगों को एक एक पल का इन्तजार मुश्किल हो रहा था। आखिरकार नियत समय पर गाडी स्टेशन पहुंची और धीरे धीरे रेंगती हुई रुक गयी। 
गाडी रुकते ही ताराचंद डब्बे के दरवाजे पर आ गए। इस २-३ साल के अरसे ने युवा ताराचंद के व्यक्तित्व में बहुत बदलाव ला दिया था। कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी व साहस जैसे गुणों ने युवा ताराचंद के व्यक्तित्व को बहुत ही प्रभावशाली व् आकर्षक बना दिया था। ताराचंद को दरवाजे पर देखकर स्टेशन का माहौल जोश व् ख़ुशी से भर उठा। शुरू में यह स्थिति ताराचंद के लिए बहुत आश्चर्यचकित करने वाली थी लेकिन जल्दी ही वो सहज होकर इस माहौल का हिस्सा बन गए। स्वागत के इस अवसर पर स्टेशन पर उपस्थित सेंकडो लोगो की आँखें ख़ुशी व् गर्व से चमक रही थी। युवा ताराचंद के लिए इन चमकती आँखों में यह भेद करना असंभव था की इनमें कौन अपने परिवार का है तथा कौन अपने परिवार का नहीं है। सबके चेहरों व् आँखों में एक सामान गर्व व् अपनत्व का भाव था। यह अहसास ताराचंद के लिए अद्भुत व् बेहद प्रेरणादायक था। थोड़ी देर तक बधाई स्वीकार करने, बुजुर्गों से आशीर्वाद लेने व् अन्य से गले मिलने मिलाने का भावुक सिलसिला चलता रहा। इसके बाद स्टेशन मास्टर व् स्टाफ ने बड़े आग्रह पूर्वक सभी का मुँह मीठा कराया। ताराचंद ने स्टेशन मास्टर का भी गले मिलकर धन्यवाद किया तथा इजाजत चाही। थोड़ी देर बाद ही ये जोश से भरा काफिला गांव के लिए प्रस्थान कर गया। 
मैंने इंस्पेक्टर ताराचंद के गाँव आगमन व् भावपूर्ण स्वागत का वर्णन कुछ ज्यादा ही विस्तार से किया है। इसके पीछे मेरा उद्देश्य यह इंगित करना भी है की जहाँ समाज में एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों की संकुचित सोच व् देश तथा समाज के प्रति नकारात्मक क्रियाकलाप पूरे समाज में नफरत व् भेदभाव का माहौल पैदा कर देते हैं। दूसरी और मात्र एक व्यक्ति का ही सकारात्मक सोच व् समाज तथा देश के लिए किया गया उद्देश्यपूर्ण कार्य किस प्रकार आपसी भेदभाव व् मनमुटाव को भुला कर व्यक्तियों को प्रेम व् एकता के सूत्र में बाँध देता है। इस सामाजिक सिद्धांत को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने अपने चरित्र व् कार्य से बारबार स्थापित किया है। भारत के ही परिपेक्ष्य में राष्ट्रपिता के चरित्र व् कार्यशैली ने भारत के बेबस, डरे हुए, गुलामी की मानसिकता में जकड़े तथा भ्रमित समाज को एक नैतिक, निडर तथा उद्देश्य के लिए समर्पित समाज में बदल दिया। 

जोश से भरा यह काफिला गांव पहुंचा तो गांव से बाहर एक और अद्भुत नजारा था। २०-२५ बाल्मीकि अपने ढोलों के साथ गांव से बाहर पहले से ही उपस्थित थे। काफिले को देखते ही उन्होंने बड़े उत्साह से भंगड़ा अंदाज में थिरकते हुए ढोल बजाना शुरू कर दिया। बैलगाड़ियों से उतर कर अन्य लोगों ने भी उनकी ख़ुशी के इस इजहार में उत्साह के साथ शिरकत की। यह पूरा नजारा बड़ा अद्भुत तथा गांव में अपने प्रकार का पहली बार था। बाद में ताराचंद के बड़े भाई चौधरी कुंदन सिंह ने परंपरा के अनुसार अच्छे खासे इनाम से इन ढोलिओं को नवाज कर विदा क्या। गांव में युवा ताराचंद के शुरू के ३-४ दिन यूँ ही गहमा गहमी व् अन्य लोगों से मिलने मिलाने में निकल गए। इन दिनों में ताराचंद ने अपने बचपन के युवा साथियों के साथ पुरानी यादें साझा की तथा सभी युवा साथी उन सभी स्थानों पर जी भरकर घूमे जहाँ बचपन व् किशोरावस्था में गिल्ली डंडा व् कबड्डी जैसे खेल खेला करते थे। बड़े भाई कुंदन सिंह खुद घुड़सवारी के शौकीन थे तथा परिवार के पास एक बहुत अच्छी नस्ल का घोडा भी था। ताराचंद अपनी पुलिस ट्रैनिंग के दौरान तथा नौकरी के शुरू के दिनों में खूब घुड़सवारी कर चुके थे तथा इस कला में उन्हें महारत हासिल थी। अतः इन दिनों में ताराचंद ने अपने साथियों के घुड़सवारी का भी भरपूर आनंद लिया और साथियों को घुड़सवारी के बहुत से गुर सिखाये।  
बचपन के साथियों के आग्रह पर गांव के परंपरागत खेल कबड्डी के मैच का आयोजन भी रखा गया। स्वयं युवा ताराचंद ने इस आयोजन में उत्साह के साथ भाग लिया। यह आयोजन बहुत ही ज्यादा उत्साहवर्धक रहा। पूरा गांव ही आयोजन स्थल पर उमड़ पड़ा। अपने युवाओं की उमंग, जोश तथा खेल में उनके दांव पेंच देखकर गांव के बुजुर्ग भी उछल उछलकर उनका उत्साहवर्धन करते रहे। बुजुर्गों को लग रहा था जैसे वो भी अपनी जवानी के दिनों में पहुँच गए हों। मैच के बाद मिठाई और फल आदि वितरित किये गए। वास्तव में अपनी इन छुट्टियों का अपने लोगों के साथ भरपूर आनंद लेने तथा इन्हें अधिक से अधिक उपयोगी बनाने की पूरी रूपरेखा ताराचंद ने पहले ही तैयार कर रखी थी। इसी कड़ी में बच्चों के लिए भी खेलकूद व् अंताक्षरी आदि के अनेक कार्यक्रम रखे गए। बच्चों को अनेक छोटे छोटे आकर्षक उपहार देकर उनकी ख़ुशी व् उत्साह को कई गुना बढ़ा दिया गया। इस अवसर के लिए बालोपयोगी अनेक उपहार ताराचंद स्वयं अपने साथ लाये थे। गांव के बुजुर्ग ताराचंद की प्रशंशा करते उन्हें आशीर्वाद देते थक नहीं रहे थे। वो बार बार कहते थे की ताराचंद के आने से हमारे जीवन की संध्या बेला में भी जैसे बहार आ गयी। गांव का ठहरा हुआ व् एक हद तक नीरस जीवन बेहद उत्साह बी उमंग से भर उठा। 
इस काल में भारत के लाखों गांव की तरह गांव घिस्सुखेडा में भी जीवन के लिए आवश्यक मूलभूत सुविधाओं का पूरी तरह आभाव था। गांव में पानी के निकास तथा स्वच्छ्ता बनाये रखने के लिए कोई स्थायी प्रबंधन नहीं था। बुनयादी शिक्षा की भी कोई व्यवस्था निजी या शाशन स्तर पर नहीं थी। प्राइमरी स्कूल भी गांव से लगभग ५ किलोमीटर दूर क़स्बा चरथावल ही में था। सबसे बड़ी परेशानी यह थी की आमजन इन समस्याओं के प्रति उदासीन था तथा इसके निराकरण के लिए जिस सामुदायिक भावना या पहल की जरुरत थी वो गांव के जनमानस में विकसित ही नहीं हो पायी। गांव का कूड़ा कचरा तथा पशुओं का गोबर आदि जहाँ भी जगह मिलती डाल दिया जाता था। इससे मच्छर मक्खी तथा अन्य हानिकारक जीवाणुओं का प्रकोप बहुत ज्यादा बढ़ जाता था तथा वातावरण भी हर समय दूषित रहता था। इस अज्ञानता व् लापरवाही के चलते गांव के लोग विशेषकर बच्चे और औरतें आदि अनेक बीमारियों का शिकार होते रहते थे। बीमारियों के सही समय पर निदान और उनके उपचार की भी कोई सक्षम व्यवस्था नहीं थी। 

कई दिन के इस उत्सवपूर्ण माहौल के बाद ताराचंद ने पहले से तय अपने प्रोग्राम के अनुसार छुट्टियों के बाकी बचे सात आठ दिन इन समस्याओं के निराकरण के लिए प्रयत्न करने का निश्चय किया। 

Thursday, February 18, 2016

13-समसामयिक विवेचना तीसरा दशक

गांव के जीवन में एक बदलाव साफ़ नजर आने लगा था कि अशिक्षा के कारण जड़ता की स्थिति कुछ कुछ कम हो रही थी। गांव में संचार साधनों का तो पूरी तरह से अभाव था लेकिन राजनीतिक व् सामाजिक चेतना का प्रभाव व् प्रसार किसी न किसी माध्यम से गांव में प्रवेश करने लगा था। कुछ तो अशिक्षा के कारण और कुछ संचार व् आवागमन के साधन न होने के कारण आम ग्रामीण की जानकारी का दायरा बहुत सीमित था। अपने देश और दुनिया के बारे में जानकारी बहुत कम थी आम ग्रामवासी को बस इतना ही जानकारी थी कि भारत का राज्य सात समुन्दर पार बैठे अंग्रेज राजा के हाथ में है तथा दिल्ली में बैठा लाटसाहब भारत में उसके काम को देखता है। ये अज्ञान जहाँ एक तरफ उनकी बहुत बड़ी कमजोरी थी लेकिन दूसरी तरफ उनकी सरलता व् आत्मसंतुष्टि का बहुत बड़ा कारण भी था। जनमानस में परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। जिला मुख्यालय, नजदीक के बड़े कस्बों में भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस व् आर्यसमाज जैसी सामाजिक व् धार्मिक संस्थाओं द्वारा अनेक कार्यक्रम, जलसे सत्संग व् रैलियां आदि प्रायोजित किये जा रहे थे। कुछ ग्रामीण इन कार्यक्रमों में भाग भी लेने लगे थे और कुछ इन संस्थाओं के सक्रिय सदस्य बन गए थे। इन्हीं में से कुछ आगे बढ़कर इन संस्थाओं के साथ जुड़ गए तथा उनका पूरा जीवन उद्देश्य ही बदल गया। इन्होने अपना पूरा जीवन ही देश की आजादी को प्राप्त करने तथा एक नए भविष्य का निर्माण करने के लिए समर्पित कर दिया। इन्हीं सक्रिय लोगों के द्वारा देश में चल रहे राजनीतिक व् सांस्कृतिक घटनाक्रमों की जानकारी दूर देहात में दी जा रही थी तथा इसका व्यापक असर भी हो रहा था।
गांधीजी १९१८

दांडी यात्रा १९३०
गांधीजी तत्कालीन भारतीय राजनीति में एक अंधड़ की तरह छा गए थे। उनका उत्थान जनमानस के लिए एक शीतल व् सुखद वायु के झोंके की तरह था। उनके चमत्कारिक व्यक्तित्व एवं संदेशों ने लोक मानस को बेहद आंदोलित कर दिया था तथा एक नई व् विशिष्ट राजनीतिक चेतना उत्पन्न कर दी थी। जैसे जैसे इस नयी राजनीतिक चेतना का विस्तार सुदूर ग्रामीण अंचलों में फ़ैल रहा था लोगो की सोच का दायरा भी व्यापक होता जा रहा था। लोगों की अन्धविश्वास व् स्वार्थ से ग्रसित जड़ मानसिकता में नयी तरंगे उठ रही थी। आजादी अमूल्य है तथा इसे प्राप्त करने के लिए कोई भी त्याग व् कुरबानी कम है ये भावना निरंतर बढ़ती जा रही थी। साध्य की प्राप्ति के लिए साधनों की पवित्रता बनाये रखना तथा हर हालत में सत्य का अनुसरण, इसका मर्म लोग समझने लगे थे। गांधीजी का सत्य व् अहिंसा पर आधारित आंदोलन लोगों को व्यवहारिक व् आजादी प्राप्त करने का सर्वोत्तम उपाय लगने लगा था। 
लोगों में दमन का डर तथा उससे उत्पन्न बेबसी लगातार कम होने लगी थी। वैसे भी ये शाश्वत सत्य है की जब व्यक्ति सत्य के मार्ग पर अडिग होता है तो किसी भी प्रकार का डर या शंका का स्थान उसके जीवन में नहीं रहता। अब तक आम आदमी के फर्ज का दायरा बेहद सीमित था। केवल धन अर्जन करना व् अपने परिवार का पालन पोषण करना ही आम आदमी का मुख्य उद्देश्य था। लेकिन अब फर्ज के दायरे में राष्ट्र व् समाज के प्रति अपने दायित्व का भी प्रमुख स्थान हो गया। सामाजिक जीवन के इस बदलाव ने, बाद के वर्षों में, संयुक्त प्रान्त के इस अपेक्षाकृत पिछड़े पश्चिमांचल में भी अनेक स्वतंत्रता सेनानी पैदा किये। स्वतंत्रता सेनानियों की इस पौध ने विकसित होकर देश की आजादी के आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभायी।  
धार्मिक चेतना एवं धार्मिक विश्वासों में भी इस समय काफी सकारात्मक परिवर्तन हुए। लोगों के धार्मिक आचरण में भय से उत्पन अन्धविश्वास व् कुरीतियों का स्थान निरंतर काम होने लगा। धर्म का वास्तविक स्वरुप क्या है, उसका जीवन में क्या स्थान है इस विषय में लोग और अधिक समझदार व् जागरूक होने लगे। धर्म का वास्तविक उद्देश्य सत्य के प्रति निष्ठा तथा अपने व् समाज के प्रति मानवीय कर्तव्यों का पालन ही है, ये भावना विकसित हुयी। भारतीय सामाजिक जीवन में यह बदलाव बहुत ही सकारात्मक था तथा इसने आगे चलकर आजादी प्राप्त करने तथा नव राष्ट्र निर्माण में बहुत योगदान किया।

Monday, February 15, 2016

12- 1925 का वो भारतीय पुलिस पदक

तय समयानुसार २० मार्च को इलाहबाद पुलिस मुख्यालय पर एक भव्य समारोह में पदक प्रदान किये गए। इस अवसर पर मुख्य अतिथि गवर्नर के साथ साथ पुलिस विभाग के अन्य उच्चाधिकारी, मेयर इलाहबाद तथा अनेक गणमान्य नागरिक भी उपस्थित थे। इस बार संयुक्त प्रान्त पुलिस में केवल चार ही अधिकारीयों को यह सम्मान प्राप्त हुआ था। पुलिस पदक प्राप्त करने वालो में इंस्पेक्टर ताराचंद का पहला ही नंबर था। माइक पर अपने नाम की उद्घोषणा होने के बाद इंस्पेक्टर ताराचंद बहुत ही सधे हुए क़दमों से स्टेज पर पहुंचे। प्रोटोकॉल के अनुसार कप्तान माइकल को ही पदक प्राप्त करने से पहले अधिकारी की उपलब्धियों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करना था। कप्तान माइकल ने बड़े उत्साह पूर्वक बताया की संयुक्त प्रान्त के पुलिस विभाग में अब तक भारतीय पुलिस पदक का सम्मान प्राप्त करने वाले इंस्पेक्टर ताराचंद सबसे युवा अधिकारी हैं। वैसे तो पुलिस विभाग में किसी बड़े अपराध के उन्मूलन के लिए किये गए सफल अभियान के पीछे एक पूरी टीम का योगदान होता है लेकिन मैं ये दृढ़ता पूर्वक बताना चाहूंगा कि इंस्पेक्टर ताराचंद के नेतृत्व में अपराध उन्मूलन के जितने भी अभियानों में सफलता मिली है उसमें इस युवा अधिकारी के व्यक्तिगत साहस, कार्यकुशलता तथा ईमानदार प्रयासों की प्रमुख भूमिका है। अपनी पुलिस सेवा के संक्षिप्त कार्यकाल में इस युवा अधिकारी ने जो मिसाल कायम की है वो विभाग के अन्य सभी पुलिस कर्मियों के लिए अनुकरणीय है। संयुक्त प्रान्त के गवर्नर ने कप्तान माइकल की बातों को बड़े ध्यान से सुना तथा संज्ञान लिया। गवर्नर ने प्रोटोकॉल से हटकर पदक प्रदान करने के बाद युवा अधिकारी से गर्मजोशी से हाथ मिलाया तथा कंधे पर हाथ रखकर कहा "बहुत खूब मुझे तुम पर गर्व है, और आगे बढ़ो मेरी शुभकामनायें तुम्हारे साथ हैं। पूरा समारोह बहुत देर तक तालियों से गूंजता रहा। गांव घिस्सुखेड़ा में भी इंस्पेक्टर ताराचंद को यह सम्मान मिलने तथा उनकी उपलब्धियों की खबर पहले ही पहुँच चुकी थी। धीरे धीरे आसपास के गांव में भी खबर फ़ैल गयी। बहुत से लोग परिवार को बधाई देने व् अपनी ख़ुशी का इजहार करने आ रहे थे। गांव के बेटे की इस उपलब्धि पर गांव का प्रत्येक व्यक्ति फूला नहीं समा रहा था। प्रत्येक व्यक्ति आपसी भेदभाव भूलकर खुद को भी गौरवान्वित महसूस कर रहा था। 

इंस्पेक्टर ताराचंद पर भी बहुत दिनों से गांव आने का आग्रह बढ़ता जा रहा था। अपने परिवार वालो व् गांव वालों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए ताराचंद ने उनको तार द्वारा सूचित किया की कुछ आवश्यक कार्य निबटाने के बाद वो शीघ्र ही गांव आएंगे। 

गांव घिस्सुखेड़ा तथा आसपास के सभी गांव की हालत अब भी जस की तस थी। शिक्षा तथा स्वास्थ्य के विषय में अब भी कोई सुधार नहीं हुआ था। गांव के लगभग ९५ प्रतिशत लोग अब भी निरक्षर थे तथा सरकारी दस्तावेजों में हस्ताक्षर के बजाय उनके अंगूठों के निशान ही चलते थे। १०-१५ गांव के समूह में बिमारियों के इलाज व् किसी भी आक्समिक चिकित्सा के लिए पड़ोस के एक नजदीकी व् बड़े गांव कुटेसरा में केवल एक ही खानदानी हकीम साहब उपलब्ध थे। ये खानदान कई पीढ़ियों से हकीमयत कर रहा था। हकीम साहब का पूरा दवाखाना बटुए में उनकी जेब में रहता था। किसी भी बिमारी का निदान हकीम साहब नब्ज पढ़कर तथा पेशाब का रंग देखकर किया करते थे। ज्यादातर मामलों में कुछ ईश्वर की कृपा, मरीज की किस्मत और हकीम साहब की हकीमगिरी  की वजह से मरीज को फायदा हो ही जाता था। गांव वालों का हकीम साहब पर अटूट विश्वास था। या यूँ कहें की इलाज का कोई दूसरा विकल्प ही मौजूद नहीं था। वैसे भी उस समय गांव की फिजा में न तो वायु प्रदुषण था और न ही खाने पीने की वस्तुओं में मिलावट थी। लोगों की मानसिकता भी सरल तथा दुविधा मुक्त थी। ऐसे में बीमार पड़ने की सम्भावना वैसे ही कम हो जाती है। लोग यदि बीमार पड़ते भी थे तो या तो संक्रामक बीमारियों के कारण अथवा शादी ब्याह में अधिक व् बेमेल खाना खाने के कारण। संतुलित भोजन की पूर्ण जानकारी न होना भी बीमार होने का प्रमुख कारण था। वास्तव में तब गांव का जीवन बहुत ही नैसर्गिक था। कभी कभी आपसी स्वार्थों का टकराव या मूंछों की लड़ाई ही उनके लिए परेशानी का सबब बनती थी। 

Thursday, February 11, 2016

11-चारित्रिक विवेचना

विश्व में अंग्रेज कौम विशेषकर इंग्लैंड के सन्दर्भ में बेहद परम्परावादी तथा अपने अतीत के प्रति कुछ अधिक ही मोहग्रस्त है। विश्व के अनेक देशों में अपने सम्राज्य्वादी इतिहास के कारण इस कौम को अपनी श्रेष्ठता का भी अनावश्यक अभिमान रहा है। भारत तथा विश्व के कुछ और देशो में अपने साम्राज्य की स्थापना तथा लम्बे समय तक उसे बनाये रखने के दौरान इस कौम का इतिहास एक शोषक के रूप में रहा है। शोषक के रूप में अपने अतीत के कारण इस कौम का चरित्र कई बुराईयों से ग्रस्त रहा। इसके चरित्र में अच्छाई, बुराई, छल कपट के साथ ही त्याग व् वीरता का भी विचित्र मिश्रण देखने को मिलता है। इसी कारण इस कौम में अनेक बुद्धिजीवी, विचारक, साहित्यकार व् योद्धा भी पैदा हुए हैं। 

     भारत में ब्रिटिश शाशन के दौरान नागरिक प्रशाशन के उच्च पदों पर अंग्रेज अधिकारियों की ही नियुक्ति होती थी। कमिश्नर, जिला कलेक्टर, पुलिस कप्तान व् पोस्ट मास्टर जनरल जैसे पदों पर अंग्रेज अधिकारी ही नियुक्त होते थे। यही हाल सैन्य सेवाओं का भी था। प्रशाशन के निचले पदों पर ज्यादातर भारतीय नियुक्त किये जाते थे। 

     भारत में प्रशाशन के उच्च पदों पर रहते हुए अंग्रेज अधिकारीयों के चरित्र में अनेक बुराईयाँ घर कर गयी थी। क्लब, डांस, शराब, जुआ, तथा अयाशियाँ आदि इनके चरित्र की कुछ ऐसी बुराईयाँ थी जो इनकी जीवन शैली में पूरी तरह व्याप्त हो गयी थी। लेकिन उपरोक्त बुराईयों के बावजूद इन अंग्रेज अधिकारियों के चरित्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता भी थी। साहस, ईमानदारी तथा कर्मठता जैसे मानवीय गुणों के प्रति इनमें बेहद आकर्षण था। अपने अधीनस्थ जिस अधिकारी में भी वो ये गुण पाते थे, उसकी प्रशंशा व् हौसलाअफजाई करने में भी कोई कंजूसी नहीं करते थे। 

     कप्तान माइकल व् इंस्पेक्टर ताराचंद के बीच भी कुछ इसी प्रकार का भावनात्मक रिश्ता कायम हो गया था। जैसे ही कप्तान माइकल ने इंस्पेक्टर ताराचंद में इन गुणों को पाया उसने प्रोटोकॉल से हटकर भी इंस्पेक्टर की सार्वजानिक प्रशंशा व् हौसलाअफजाई की। वास्तव में कप्तान माइकल खुद एक हद तक ईमानदार व् कर्तव्यनिष्ठ ऑफिसर थे। इस प्रकार कप्तान माइकल को यह महसूस होता था की इंस्पेक्टर ताराचंद की प्रशंशा करके वह स्वयं की भी प्रशंशा कर रहा है और उनको एक बेहद आत्मसंतोष की अनुभूति होती थी। 

     एक चरित्रहीन व्यक्ति कभी भी एक चरित्रवान व्यक्ति की प्रशंशा नहीं कर सकता, यह उसके लिए आत्मघात के समान होता है। जबकि एक चरित्रवान व्यक्ति दूसरे चरित्रवान व्यक्ति में अपना ही रूप देखता है। यह उसके चरित्र की धार को और अधिक चमकाता है तथा अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए और अधिक आत्मविश्वास पैदा करता है। एक योद्धा ही दूसरे योद्धा की प्रशंशा कर सकता है तथा उसका सही मूल्यांकन कर दोनों ही एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं।

कप्तान माइकल के सन्देश के अनुसार इंस्पेक्टर ताराचंद अगले दिन उनसे मिलने मुख्यालय पर पहुंचे। मिलने पर इंस्पेक्टर ताराचंद ने एक बार पुनः कल के सन्देश के लिए कप्तान का धन्यवाद किया। कप्तान माइकल ने बड़े ही प्रशंशा भाव से उसी तरह इंस्पेक्टर की तरफ देखा जैसे किसी घर का सदहृदय मुखिया अपने परिवार के किसी सदस्य की बड़ी उपलब्धि पर उसकी और देखता है। इसके बाद कप्तान ने पुलिस मुख्यालय इलाहबाद से प्राप्त पदक के विषय में गवर्नर ऑफिस से जारी अधिसूचना की प्रति इंस्पेक्टर को दी तथा २० मार्च को होने वाले समारोह के विषय में मुख्यालय से प्राप्त प्रोग्राम तथा प्रोटोकॉल का विवरण भी दिया। कप्तान ने उस दिन संपन्न होने वाले समारोह के प्रोटोकॉल आदि के विषय में अपनी तरफ से निर्देश दिए। कप्तान माइकल ने हँसते हुए कहा मिस्टर ताराचंद ये केवल तुम्हारा ही सम्मान नहीं है मैं भी अपने को बेहद गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ। झाँसी के पूरे पुलिस विभाग में इसका बड़ा सकारात्मक और प्रेरक सन्देश गया है। कुछ देर की चुप्पी के बाद कप्तान ने पुनः जोर से हँसते हुए कहा लेकिन लगता है ये खबर यहाँ के अपराधियों व् डकैतों को काफी बुरी लगने वाली है। इंस्पेक्टर ताराचंद ने भी हँसते हुए कहा की श्रीमान इस सब में आपके सहयोग और दिशानिर्देशों का बहुत बड़ा हाथ है। कप्तान ने फिर बताया की प्रोटोकॉल के अनुसार उस दिन समारोह में मुझे भी उपस्थित रहना होगा तथा नियमानुसार पदक प्रदान करने से पहले तुम्हारी उपलब्धियों की संक्षिप्त जानकारी भी मुझे ही देनी होगी। इस के बाद कुछ आवश्यक विचार विमर्श के बाद इंस्पेक्टर ताराचंद ने कप्तान माइकल से जाने की इजाजत मांगी। 
थाने पहुँच कर इंस्पेक्टर ताराचंद ने अफसर दोयम यादव और थाने के बड़े मुंशी को २० मार्च से पहले पुलिस मुख्यालय इलाहबाद पहुँचने के लिए आवश्यक व्यवस्था करने को कहा। इसके बाद थाने में पहले से ही बैठे हुए कुछ शहरवासियों की समस्या सुनने में व्यस्त हो गए। 

झाँसी शहर की कानून व्यवस्था की स्थिति काफी सुधर गयी थी। ज्यादातर अपराधियों व् उनको संरक्षण देने वालो ने चुपचाप भूमिगत हो जाने में ही अपनी खैरियत समझी। अरसे से इस क्षेत्र या आसपास के क्षेत्र में किसी डकैती या बड़े अपराध की घटना नहीं हुयी। 


दो दिन बाद नगरपालिका झाँसी में भी मेयर ने एक भव्य अभिनन्दन समारोह रखा जिसमे शहर के काफी नागरिक सम्मिलित हुए। मेयर ने अपने सम्बोधन में कहा की इंस्पेक्टर ताराचंद ने साहब ने यह साबित कर दिया है की यदि एक दृढ इच्छाशक्ति वाला अधिकारी ईमानदारी से अपने फर्ज को पूरा करने की ठान ले तो उसके नतीजे चमत्कारी होते हैं। आज इस शहर के ग्रामीण अंचल में डाकुओं का आतंक लगभग खत्म हो गया है इसके साथ ही कालाबाज़ारी तथा खाद्यवस्तुओं में मिलावट करने वाले अपराधी भी जेलों में हैं। 

Tuesday, February 9, 2016

10-अतीत का रोमांच

मेरा झाँसी प्रवास व् भ्रमण बहुत ही सुखद और प्रेरणादायक रहा। वहां जुटाई जानकारियों, इससे जुड़े घटनाक्रम और घटनाक्रम के मुख्य चरित्र इंस्पेक्टर ताराचंद ने मुझे बेहद प्रभावित किया। युवावस्था में किसी भी व्यक्ति की कुछ भौतिक आवश्यकताएं तथा अपने व् अपने परिवार के लिए कुछ सपने होते हैं। यह होना एक बेहद स्वाभाविक बात है। इन सबके लिए साधन व् पैसे की आवश्यकता होती है। पुलिस विभाग में नौकरी करते हुए गलत साधनो से आसानी से पैसा इकठ्ठा किया जा सकता है तथा युवावस्था के धन से जुड़े सभी सपने पूरे किये जा सकते हैं।  लेकिन इस सुलभ अवसर का लाभ न लेकर तथा अपनी भौतिक आवश्यकताओं व् इच्छाओं को सीमा में बांधकर जब कोई युवा अपने फर्ज को पूरा करने तथा अपने आदर्श व् मूल्यों को बनाये रखने में  बेहद ईमानदार साबित होता है तो यह सराहनीय व् दूसरों के लिए बेहद प्रेरणादायक साबित हो जाता है। अपने परिवार के अतीत को खंगालने के दौरान मैंने यह पाया की इस परिवार के मुख्य किरदार इंस्पेक्टर ताराचंद ने अपनी भावी पीढ़ियों के लिए एक उत्कृष्ट विरासत छोड़ी है। 

बाद के दिनों में इंस्पेक्टर ताराचंद से जुडी अतीत की उन सभी घटनाओं व् इन सबका अपने आज के परिवार पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करते हुए मैंने समझा की अतीत एक केवल गुजर गया घटनाक्रम नहीं है। इसका प्रभाव व्यापक तौर पर वर्तमान पर होता है। इक पुरानी कहावत "जो बीत गया सो बीत गया आगे की सुधि ले" मात्र एक हो चुकी घटना के अच्छे या बुरे प्रभाव तक ही सीमित है। एक समृद्ध व् गौरवशाली अतीत का वर्तमान भी उत्कर्ष होगा इसकी सम्भावना प्रबल होती है पर एक निष्क्रिय, भ्रष्ट और अनैतिक अतीत की विरासत ढोते हुए आमतौर पर कोई भी वर्तमान उत्कर्ष और सम्पूर्ण नहीं हो सकता।

किसी भी कालखण्ड में, किसी भी देश या देश के एक भाग में, राजनीतिक, सामाजिक व् आर्थिक परिस्थितियां समय के साथ बदलती रहती हैं। पर कुछ आदर्श व् मूल्य सर्वकालिक व्  शाश्वत होते हैं लेकिन कितनी भी विषम परिस्थितियों के चक्रव्यूह को भेदकर जो चरित्र अपने आदर्श व् मूल्य बनाये रखता है वही भविष्य में पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायक होता है। अपने परिवार के उस अतीत का वर्तमान पर जो प्रभाव हुआ है उसका और अधिक विश्लेषण करने पर मैं चौकन्ना हो गया और इस निष्कर्ष पर पहुंचा  की एक व्यक्ति के लिए जीवन में काफी सजग रहने की आवश्यकता है। यदि व्यक्ति अपने जीवन में आदर्श व् मूल्यों के प्रति जागरूक व् ईमानदार है तो उसके चरित्र का जरा सा भी विचलन आने वाले कल व् पीढ़ियों के लिए नकारात्मक व् दुविधापूर्ण परिस्थितियां पैदा कर सकता है। 

आज हम सब जो जहाँ हैं सब वर्तमान के शिल्पकार हैं। अपने अतीत से प्रेरणा व् ऊर्जा लेकर व् एक सीमा तक नियति द्वारा निर्धारित कर्मक्षेत्र में अपनी भूमिका निभाकर भविष्य की रचना कर रहे हैं। इस प्रकार हम सब यानी आज का वर्तमान अतीत व् भविष्य की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। जीवन की अनादि व् अनंत श्रंखला में वर्तमान रुपी इस कड़ी का बहुत महत्त्व हैं। इस प्रकार अतीत को सही ढंग से समझना तथा वर्तमान में अपनी भूमिका का ईमानदारी व् सावधानी पूर्वक निर्वाह उज्जवल भविष्य के लिए अनिवार्य है। अपनी इस कर्मयात्रा में कहीं अनैतिक या भ्रष्ट पथ विचलन न हो जाये इसके लिए जीवन में आदशों  व् मूल्यों के प्रति प्रबल आग्रह अति आवश्यक है। 

समय या काल असीम व् अनंत है तथा निरंतर गतिमान है। हम सब को ही किसी न किसी रूप से समय की अविरल गति के साथ तालमेल बैठाना होता है। समय के इस अनंत महासागर में हम सब अपनी अपनी क्षमता व् नियति के अनुसार जीवन रूपी नौका को चला रहे हैं। हममें से बहुत से इस महासागर में बहुत दूर तक नहीं जा पाते और इस प्रकार हमारा कर्मक्षेत्र बहुत ही सीमित रह जाता है। लेकिन हममें से कुछ दृढ इरादे व् अद्भुत साहस के साथ इसकी अथाह गहराईयों को नापते हैं तथा अनमोल मोती निकालकर आने वाली पीढ़ियों को उपहार देते हैं। इस प्रकार समय चक्र चलता रहता हैं। घटित घटनाएँ सापेक्ष होती हैं लेकिन आदर्श व् मूल्य शाश्वत होते हैं। 

इंस्पेक्टर ताराचंद का झाँसी का कार्यकाल ठीक ठाक चल रहा था। इस समय तक उनके खाते में अपराध उन्मूलन को लेकर कई नयी उपलब्धियां दर्ज हो गयी थी। इसकी सूचना बराबर जिला मुख्यालय व् प्रदेश पुलिस मुख्यालय तक पहुँच रहीं थी। उच्च अधिकारीयों व् शहर के अनेक गणमान्य नागरिकों द्वारा प्रेषित कई प्रशंशा पत्र भी प्राप्त हो रहे थे। थाने के अधीनस्थ स्टाफ को भी इन उपलब्धियों व् इस कार्यशैली से मजा आने लगा था। सच्चाई व् ईमानदारी से उत्पन्न वातावरण बेहद सुखद व् गौरवशाली अनुभूति पैदा करता है। स्टाफ यह अनुभव कर रहा था कि भ्रष्ट आचरण से प्राप्त रसमलाई के मुकाबले ईमानदारी से प्राप्त रोटी का स्वाद ज्यादा सुखद व् मीठा होता है। पूरा स्टाफ अपने को भयमुक्त, ऊर्जावान तथा पहले से कहीं बेहतर अनुभव कर रहा था। 

यह सन १९२५ का फरवरी महीना था। चारों और बसंत की खुशनुमा शुरुवात हो चुकी थी। मौसम बेहद सुखद और ऊर्जावान था। इंस्पेक्टर ताराचंद अपने सुबह के दैनिक कार्यक्रम निबटा कर थाने में आये शहर के कुछ गणमान्य नागरिकों के साथ बैठे विचार विमर्श कर रहे थे, तथा शहर की क़ानून व्यवस्था की स्थिति पर उनके विचार प्राप्त कर रहे थे। तभी थाने के मुंशी ने आकर बताया की हुजूर कप्तान साहब वायरलेस पर आपसे बात करना चाहते हैं। इंस्पेक्टर ताराचंद ने तुरंत वायरलेस पर कप्तान साहब को सुना। 

पुलिस कप्तान माइकल ने कहा " बधाई, मिस्टर ताराचंद आपके लिए एक बड़ी खुशखबरी है। आज ही पुलिस मुख्यालय इलाहबाद से सन्देश प्राप्त हुआ है कि तुम्हारा भारतीय पुलिस  पदक कन्फर्म हो गया है। यह पुलिस पदक तुम्हे अगले माह की २० तारीख को पुलिस मुख्यालय पर एक समारोह में गवर्नर द्वारा प्रदान किया जायेगा। तुम कल ही पुलिस मुख्यालय आकर मुझसे मिलो, इस विषय में उचित निर्देश मैं तुम्हें मिलने पर ही दूंगा।" इंस्पेक्टर ताराचंद ने पुलिस कप्तान का आभार प्रकट किया और उनको धन्यवाद दिया। यह सुनकर पास ही बैठे अफसर दोयम सब इंस्पेक्टर राजपाल यादव अति उत्साहित हो गए और कहा " श्रीमान इस अवसर को हम सब जरूर सेलेब्रेट करेंगे।" पास बैठे नागरिकों और विशेषकर झाँसी के डिप्टी मेयर ने इस सुझाव का तुरंत समर्थन किया। थोड़ी देर में ही मिठाई आदि की व्यवस्था की गयी और पूरा थाने का माहौल बेहद उल्लासपूर्ण हो गया। डिप्टी मेयर ने भी कहा "इंस्पेक्टर साहब हम भी इस मौके को नहीं चूकेंगे और नगर पालिका प्रांगण में एक अभिनन्दन समारोह का आयोजन करेंगे।" इंस्पेक्टर ताराचंद ने सबका हार्दिक धन्यवाद किया और अपने दूसरे कामों को निबटाने के लिए इजाजत चाही।