Friday, February 26, 2016

15-सामाजिक सुधार 1925-26

सन १९२५-२६ के इस दौर में भारत में ब्रिटिश शासन पूरी मजबूती के साथ कायम था। धुरी राष्ट्रों के खिलाफ निर्णायक प्रथम विश्वयुद्ध जीतने के बाद अंग्रेजों का मिजाज वैसे ही चढ़ा हुआ था। इंग्लैंड की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं पूरे उफान पर थी। इस समय ब्रिटिश शासक वर्ग का मूल उद्देश्य हर प्रकार के हथकंडे अपनाकर भारत में राष्ट्रिय आंदोलन को नाकाम करना तथा अपने शासन को और मजबूत बनाये रखना था। भारत के प्रचुर प्राकर्तिक संसाधनों तथा आसानी से उपलब्ध मानव श्रम का शोषण व् उपयोग करके इंग्लैंड की आर्थिक सत्ता को और भी मजबूत करना था। इंग्लैंड के अनावश्यक ओद्यौगिक उत्पादों को खपाने के लिए भारत मात्र एक सुलभ बाजार था। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में नागरिक सुविधाओं के विस्तार तथा जनकल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वन शासन के योजनागत एजेंडा में ही नहीं था। यही कारण था की इस काल में भारत के लगभग ५-६ लाख गांव में स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छ्ता तथा परिवहन की स्थिति बहुत बुरी थी। 
इस समय भारत के ५-६ लाख गांव में आज की तरह गांव पंचायतें नहीं थी और न ही आज की तरह पंचायती राज व्यवस्था का कोई और रूप विद्यमान था। गांव में नागरिक सुविधाओं की स्थापना व् सक्षम संचालन के लिए किसी भी स्तर पर शासन द्वारा नियुक्त कोई अन्य संस्था भी सक्रिय नहीं थी। इस समय गांव में शासन द्वारा नियुक्त एक मुखिया होता था जो गांव का ही कोई बुजुर्ग निवासी होता था। मुखिया का भी गांव के विकास व् नागरिक सुविधाओं से कोई लेना देना नहीं था। 
ब्रिटिश शासन में एक गांव का स्टेटस भूराजस्व वसूलने की एक छोटी इकाई मात्र था। यह राजस्व मालगुजारी व् भू-लगान के रूप में अनिवार्य रूप से प्रत्येक गांव से वसूला जाता था। शासन द्वारा यह लगान वसूल करने के लिए तथा उसे जिला कोष में जमा करने के लिए पटवारी व् अमीन की स्थायी नियुक्ति की जाती थी। मुखिया का भी मुख्य काम इस राजस्व वसूली में पटवारी व् अमीन आदि की मदद करना ही था। इस लगान का कोई भी हिस्सा गांव के विकास के लिए खर्च नहीं होता था। ये शायद विश्व इतिहास में पहला विचित्र शासन था जो ग्रामीण जनता से राजस्व तो वसूलता था पर बदले में उनके कल्याण के लिए करता कुछ भी नहीं था। वैसे गांव के मुखिया की सलाह को स्थानीय प्रशासन एक हद तक महत्व देता था, जब तक वह सलाह उनके निहित स्वार्थों को नुक्सान न पहुंचाए। 
इन विषम परिस्थितयों में युवा ताराचंद गांव में मूल नागरिक सुविधाओं के विकास व् उनके रखरखाव के लिए एक स्थायी व्यवस्था चाहते थे। इसके लिए गांव वालों से सलाह मशविरा करके एक ५ उत्साही व्यक्तियों की एक स्थायी समिति बनायीं गयी तथा भविष्य में इसके कार्य निष्पादन हेतु आवश्यक खर्चों के लिए परस्पर चंदे से एक कोष भी स्थापित किया गया। ताराचंद की प्रेरणा से २-३ दिन में ही इस कोष के लिए चंदे के रूप में काफी धन इकठ्ठा हो गया। 

गांव के एक विकलांग युवक ने इसी वर्ष क़स्बा चरथावल के मिडल स्कूल से अपनी दृढ इच्छाशक्ति के बल पर मिडल पास किया था। इस युवक ने ताराचंद की प्रेरणा से एक और सहायक को साथ लेकर बहुत थोड़े मानदेय पर गांव में एक प्राइमरी स्कूल चलने की जिम्मेदारी ले ली। ४-५ दिन में ही करीब ५०-६० बच्चों ने प्राइमरी शिक्षा प्राप्त करने के लिए इस स्कूल में नामांकन करा लिया। युवा ताराचंद के लिए यह बहुत ही उत्साह वर्धक स्थिति थी। गांव में बुनियादी शिक्षा की व्यवस्था हो तथा कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे यह उनका वर्षों पुराना सपना था। यह सपना भविष्य में आशा से अधिक फलीभूत व् साकार हुआ। इस छोटे से स्कूल ने बिना किसी सरकारी मदद के बाद के वर्षों में गांव के युवकों को उस शिक्षा तक पहुँचाने व् अपने भविष्य को सफल बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभायी। 

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